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________________ डोली में विहार, बेंगलोर के पास, वि.सं. २०५१ १०-८-१९९९, मंगलवार श्रा. व. १४ ✿ श्रावक धर्म साधु धर्म का पूर्वाभ्यास है । 'श्रावक धर्म का पालन करते-करते मैं साधु-धर्म के योग्य बनूं' ऐसी श्रावक की भावना होती है । ✿ संसार का चक्र चालु रहता है विराधना से । - - प्रभु की आज्ञा की संसार का चक्र रुकता है - प्रभु की आज्ञा की आराधना से । आश्रव संसार का मार्ग है, संवर मुक्ति का मार्ग है । यह भगवान की आज्ञा है । निःशंक बन कर प्रभु की यह आज्ञा पालन करने वाला अवश्य ही संसार से तर जाता है । ✿ जब तक चित्त में संक्लेश हो तब तक स्थिरता नहीं आती । स्थिरता नहीं आने के कारण भगवान में मन नहीं लगता । हिंसा आदि के कारण से गृहस्थों का मन संक्लिष्ट रहता है । अतः संयम का सम्पूर्ण पालन नहीं हो सकता । यदि हो सकता होता तो तीर्थंकर अथवा चक्रवर्ती संसार का परित्याग नहीं करते । आत्मा के अनन्त खजाने से वंचित रखने के लिए ही मोहराजा ने आपको एक दो लाख या करोड़ का प्रलोभन दिया है । कहे कलापूर्णसूरि १ **** ***** १४३
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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