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________________ V ९-८-१९९९, सोमवार श्रा. व. १३ पंचवस्तुक में लिखी हुई विधि, (आगम की विधि ही लिखी हुई है) हमने देखी । आज भी यही विधि उपयोग में आ रही है, यह जानकर कितना हर्ष होता है ? हमारी शुद्ध परम्परा के प्रति कितना आदर जागृत होता है ? आपके अन्तर में भक्ति आ गई तो वह प्रतिपल आपको बचा लेगी । ज्ञान में अहंकार या कदाग्रह नहीं आने देगी । 'मैं कहता हूं वही सत्य है, सही है', विद्वत्ता का ऐसा गर्व विद्वान को हो सकता है, भक्त को नहीं । पूर्व पुरुषों का स्मरण करने से विद्वत्ता का गर्व दूर हो सकता है । महान् जैनाचार्य कालिकसूरि विशाल गच्छाधिपति थे । वे अविनीत शिष्यों से संतप्त थे । उनकी भूल होने पर उन्हें टोकते समय वे सामने उत्तर देने लगे । अतः सम्पूर्ण शिष्य-मण्डल का परित्याग करके शय्यातर को सूचित करके चले गये । उन्होंने शय्यातर को कहा कि यदि शिष्य अत्यन्त ही आग्रह करें तो ही बतायें, अन्यथा नहीं । सागर नामक आचार्य जो उनके ही प्रशिष्य थे, उनके पास पहुंच गये । सागर आचार्य इस बात से अनभिज्ञ थे । जोरदार कहे कलापूर्णसूरि - १ ****************************** १३९)
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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