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________________ बांए से विवेक वि. और दर्शन वि. के बीच ध्यानमग्न पूज्यश्री वि.सं. २०२३, पोष सु. ११, वांकी (कच्छ) ८-८-१९९९, रविवार श्रा. व. १२ ✿ साधु धर्म की परिभावना करने वाला श्रावक होता है । उसके योग से ही उसका श्रावकत्व स्थिर रहता है । उसके द्वारा ही उसमें दीक्षायोग्य १६ गुण प्रकट होते हैं । ✿ पुरुषार्थ जीव का, अनुग्रह भगवान का ! जिन गुणों का अभाव है वे गुण भगवान के अनुग्रह से ही प्राप्त होते हैं । ✿ चैत्यवन्दन आदि की विधि जो दीक्षा अंगीकार करने के समय की जाती है, उसमें इतनी शक्ति है कि जिससे विरति के परिणाम जागृत होते हैं और स्थिर रहते हैं । यदि चैत्यवंदन में उस समय ऐसी शक्ति थी तो इस समय कुछ भी शक्ति न हो, ऐसा बन भी कैसे सकता है ? चैत्यवन्दन वे ही हैं । दीक्षा लेकर ऐसे ही परिणाम सदा के लिए रहते हों तो किसी शास्त्र आदि की रचना अथवा उपदेशों की आवश्यकता ही नहीं पड़ती । परिणाम घट-बढ़ सकते हैं । इसीलिए यह सब प्रयत्न है । इसी कारण से सिंह + सियार की चतुर्भंगी बताई है । (कहे कलापूर्णसूरि - १ **** ******** १३५
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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