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________________ वे.- कल्पतरुवि. - दर्शन वि. -किरण वि. - देवेन्द्रसूरिजी के साथ चिन्तनमान पूज्यश्री दि.२१-०१-१९६७, वांकी (कच्छ) ७-८-१९९९, शनिवार श्रा. व. ११ शास्त्र के अध्ययन के बिना देशविरति या सर्वविरति का पालन नहीं हो सकता । अतः शास्त्रों का अध्ययन, निदिध्यासन, चिन्तन एवं भावन करना आवश्यक है । भावन कोटि में नहीं आये तब तक ज्ञान अपना नहीं बनता । ज्ञानाचार के आठ आचारों में ही इसका निर्देश है । अन्तिम तीन आचार : सूत्र, अर्थ, तदुभय । सूत्र से श्रुतज्ञान, अर्थ से चिन्ताज्ञान और तदुभय से भावना ज्ञान आता है। सूत्र से शब्दज्ञान, अर्थ से समझ और तदुभय से जीवन समृद्ध बनता है ।। प्रश्न : 'जीवन में उतारना' चारित्राचार में नहीं आता ? उत्तर : ज्ञान वही सच्चा है जो आचरण में आता है । चारित्र ज्ञान से भिन्न नहीं है । परिणतिवाला बने वह ज्ञान ही चारित्र है। 'ज्ञानदशा जे आकरी, तेह चरण विचारो । निर्विकल्प उपयोगमां, नहीं कर्म नो चारो ।' - उपा. यशोविजयजी महाराज (१२५ गाथाओं का स्तवन) (१३० ****************************** कहे कलापूर्णसूरि - १)
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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