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________________ हुए कर्म - प्रकृति गिनते हैं पर उन्हें हटाते नहीं । कर्म - प्रकृति केवल गिनने की नहीं हटाने की भी हैं । हम क्रोध, मान, माया आदि को यथावत् रखकर कर्म-प्रकृतियों को केवल गिनते रहते हैं । ध्यान के बिना समापत्ति नहीं होती । समापत्ति ध्यान का फल है । प्रश्न : मरुदेवी को समापत्ति कैसे आई थी ? तिर्यंचादि भी सम्यक्त्व प्राप्त करते हैं । उन्हें समापत्ति कहां से आई ? उत्तर : करणों की प्राप्ति दो प्रकार से होती है - ज्ञानपूर्वक एवं सहजता से, करण एवं भवन । हो जाये वह भवन, करना पड़े वह करण । निसर्गाद् अधिगमाद् वा । निसर्ग से हो वह भवन, अधिगम से हो वह करण । करण में प्रयत्न है, भवन में सहजता है । मानव मरकर मछली बना । वहां सम्यक्त्व प्राप्त हुआ । जाति स्मरण से पूर्व भव के दुष्कृतों के कारण पश्चात्ताप हुआ । यह भवन है । जो संस्कार आप डालते हैं वे जन्मान्तर में भी साथ आते है । कोई बात मैं वाचना अथवा व्याख्यान में बार-बार कहूं तो समझना कि मैं उसके संस्कार डालना चाहता हूं । ✿ समापत्ति किसे नहीं है ? टी.वी. देखनेवालों, व्यापार करनेवालों, अखबार पढने वालों आदि में भी समापत्ति है । जिस विषय में रस हो वहां समापत्ति आती है, परन्तु वह आर्त्तध्यानजनित है । अशुभ का अभ्यास अनादि काल का है । शुभ के संस्कार कभी नहीं पड़े । ✿ योग या ध्यान शिबिरों में (विपश्यना की शिबिरों में) केवल एकाग्रता पर जोर दिया जाता है, निर्मलता पर थोड़ा भी नहीं । निर्मलता-रहित एकाग्रता का कोई मूल्य नहीं है । यह तो बिल्ली को भी सुलभ है । बगुले को भी सुलभ है । जिसे भाव-चारित्र प्राप्त हुआ है उसे समापत्ति सिद्ध हुई समझें । ******* कहे कलापूर्णसूरि १२८ **
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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