SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 173
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ भगवान की भक्ति आत्मा की शक्ति को जानने के लिए हैं । बचपन से बकरों के समूह में रहा हुआ सिंह अपना सिंहत्व भूल जाता हैं, उस प्रकार हम भी अपने भीतर रहा हुआ परमात्मत्व भूल गये हैं । . ओसिया में सिद्धचक्र पूजन का अत्यन्त ही प्राचीन ताम्बे का पट्ट है । सिद्धचक्र पूजन प्राचीन काल से चलता है। किसने कहा यह नया पूजन है ? हम ओसिया गये तब प्रदक्षिणा देते समय सिद्धचक का आधा 'मांडला' देखा । मैंने ट्रस्टियों को कहा - दूसरा आधा भाग भी होना ही चाहिये । खोजने पर मिला, उसके साथ जोड़ा, मांडला तैयार हो गया, उसके बाद 'फलोदी' में वि. संवत् २०३५ में सिद्धचक्र पूजन के समय वही ताम्बे का पट्ट मंगवाया गया । मांडला बनाने की आवश्यकता नहीं पड़ी ।। उस समय सिद्धचक पूजन पढाने के लिए हिम्मतभाई आये थे । अचानक आजे सवारना पूज्यपाद अध्यात्मयोगी आचार्य भगवंतना काळधर्मना समाचार मळतां एक आंचको अनभव्यो । सदा अप्रमत्त, स्व-आराधनामां जागृत, परमात्मभक्ति - मग्न पूज्यश्री जैनशासननी जबरजस्त प्रभावना करवा साथे अनेक आत्माओने परमात्मभक्ति - नवकार मंत्रना स्मरणमा जोडीने उपकार करता गया छे । आपना शिरछत्र जवाथी दुःख थाय ते सहज छे । समस्त जैन संघोने तथा विशेषत: कच्छने न पूराय तेवी खोट पडी छे । पूज्यश्रीनो आत्मा महाविदेहमां जईने परमात्मपद पामीने आत्मकल्याण साधी लेशे । आपणने सौने ए मार्गे लई जवा सहायक बने ए ज प्रार्थना । आप बधा खूब ज समजु छो । तेओना गुणोने अनुभवेला छे । तेमना गुणो आपणा जीवनमां आवे ए साची श्रद्धांजलि छे । अमोए देववंदन कर्या छ । - एज... वज्रसेनविजयनी वंदना म.सु. ४, साबरमती, अमदावाद. 6 कहे कलापूर्णसूरि १******************************१२१
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy