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________________ प्रभु ! मैं लघु हूं, फिर भी आप मुझे समाविष्ट नहीं कर सकते । आप महान हैं, फिर भी मैं आपको समाविष्ट कर सकता हूं । बोलो, शाबाशी किसे दी जाये ? 'मुझ मन अणुमां हे भक्ति छे झाझी' मेरा मन अणु है, अत्यन्त ही लघु है, परन्तु उसमें भक्ति अत्यन्त महान् है। मेरी आराधना की नैया (दरी-तरी) का तू नाविक (माझी) है । ___ 'अथवा थिर मांही अथिर न मावे' अथवा 'स्थिर में अस्थिर नहीं समा सकता', शायद आप यह कहते हैं तो हे प्रभु ! मैं कहता हूं - बड़ा हाथी छोटे दर्पण में नहीं आ सकता ? परन्तु प्रभु ! मुझे शक्ति प्रदान करनेवाले आप ही हैं। जिसके प्रभाव से बुद्धि प्राप्त हुई उसे शाबाशी दी जाये । भगवान चाहे महान् हों, भारी हों, परन्तु भगवान का नाम सर्वथा हलका एवं सरल है । उस नाम का आलम्बन तो हम ले ही सकते हैं न ? नवकार प्रभु का नाम है । 'ॐ ह्रीं श्रीं अहँ नमः ।' यह सप्ताक्षरी मन्त्र भी 'नमो अरिहंताणं' का रूपान्तर है । यह भी नहीं जचे तो केवल 'अरिहंत' अथवा 'ॐ नमः' अथवा 'अहँ' अथवा 'ॐ' का जाप भी किया जा सकता है । समस्त मन्त्रों में प्रभु विद्यमान हैं, यह मत भूलना । मन्त्र से हमारा अनुसन्धान प्रभु के साथ अवश्य जुड़ता हैं । टेलीफोन करने पर अन्य के साथ सम्पर्क होता है, उस प्रकार मंत्र के द्वारा भगवान के साथ सम्पर्क होता है । ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है अथवा ऐसा कोई काल नहीं है कि जब प्रभु का नाम नहीं लिया जा सके । नाम आदि के रूप में ही भगवान सम्पूर्ण जगत् को पावन कर रहे हैं । भगवान का संकल्प इस प्रकार विश्व में कार्य कर रहा है । _ 'नामाकृति - द्रव्य - भावैः' । प्रभु को पकड़ रखना चाहो तो उनके नाम को पकड़ो अथवा उनकी प्रतिमा को पकड़ो । ये प्रभु के ही रूप हैं । ११२ ****************************** कहे
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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