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________________ पू. जीतविजयजी म.सा. पूज्य जीतविजयजी महाराज की स्वर्ग तिथि ३-८-१९९९, मंगलवार श्रा. व.६ - परोपकार अन्ततोगत्वा स्वोपकार ही है, जब तक यह बात समझ में न आये तब तक हम परोपकार में शिथिल ही रहेंगे। अन्य व्यक्ति मेरी वस्तु क्यों उपयोग में ले ? यदि यह वृत्ति नहीं गई तो समझ लें कि हम परोपकार-रसिक नहीं बने । भगवान के पास स्व-पर का भेद है ही नहीं । 'यह मेरा, यह पराया' - यह वृत्ति क्षुद्र है । गौतमस्वामी आदिने सुधर्मास्वामी को अपने शिष्य सोंप दिये । स्व-पर का भेद मिट गया होगा तब न ? भगवान तो समस्त जीवों के प्रति आत्म-तुल्य दृष्टिवाले थे । . हमारी जीवनभर की समता - सामायिक है । नित्य प्रति समता में वृद्धि होती रहनी चाहिये । इस मुनि-जीवन में समता नहीं आये, कषाय नहीं घटें तो कहां घटेंगे ? क्या तिर्यंच में ? नरक में ? निगोद में ? कहे १******************************११३
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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