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________________ एक दीक्षा के वर्षीदान के वरयो वि.सं. २०२३, पोषस २-८-१९९९, सोमवार श्रा. व. ५ • इक्कीस हजार वर्षों तक शासन-परम्परा चलानी है। इसी कारण से उत्तम गुरु तथा उत्तम शिष्य कैसे होते हैं, उसका यहां वर्णन किया गया है । उत्तम भूमि एवं उत्तम बीज हो तो ही उत्तम फल लगेंगे । यदि भूमि खारी हो और सड़ा हुआ बीज हो तो? दोनों में से एक भी खराब होगा, तो भी फल उत्तम नहीं आयेंगे । आर्य देशों के अतिरिक्त अनार्य देशों में आत्मा की चिन्ता है ही नहीं । आत्मा की स्वीकृति ही नहीं है, जो जन्म-पुनर्जन्म करता रहता है । से साक्षात् तीर्थंकर भी जब विधिपूर्वक हाथ जोड़ कर 'करेमि सामाइअं' की प्रतिज्ञा लेते हैं, तब ही उन्हें 'मनः पर्यवज्ञान उत्पन्न होता है । सीधे सातवे गुणस्थानक की प्राप्ति होती हैं । यह विधि के प्रभाव का उत्तम उदाहरण है । __ सात खमासमण विनय के प्रतीत हैं । प्रत्येक खमासमण में से विनय टपकता हैं । शिष्य - 'संदिसह किं भणामि' ? 'आज्ञा दीजिये, क्या कहूं ?' कहे कलापूर्णसूरि - १ १******************************१०९
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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