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________________ हों तो भगवान की कृपा चाहिये । अतः द्वितीय आवश्यक में लोगस्स के द्वारा प्रभु-भक्ति बताई है । भगवान की स्तुति, स्तवन - मंगल आदि से बोधि-समाधि की प्राप्ति होती है - इस प्रकार उत्तराध्ययन (२९) में कहा है। भगवान का संकल्प (सबको सुखी करने का, सबको मुक्ति में ले जाने का संकल्प) भगवान का नाम स्मरण - कीर्तन से हमें स्पर्श करता है। - हमारे बड़े से बड़े दोष (विषयों की आसक्ति, कषायों में लीनता आदि) प्रभु-भक्ति से दूर होते हैं। कभी आत्म-निरीक्षण करना कि मुझ में माया कितनी है ? लोभ कितना है ? वासना कितनी है ? इन सबका उन्मूलन भक्ति के बिना सम्भव नहीं है। जब तक दोषों को थपथपा कर रखेंगे तब तक गुण कैसे आयेंगे ? जब तक आप क्रोध नहीं मिटायेंगे तब तक क्षमा किस प्रकार आयेगी ? आप क्रोध आदि को दूर करें, क्षमा आदि स्वतः ही आ जायेंगे । घर में से कचरा निकालें, स्वच्छता अपने आप आयेगी । २६मी जान्युआरीए कच्छना धरतीकंपनी जेम आजे अचानक धरतीकंप थयो ते पूज्यपाद शासन प्रभावक पुन्यकाय आचार्य भगवंतश्री कलापूर्णसूरीश्वरजी म.सा.ना आघातजनक समाचार मळ्या । सौने खूब ज व्यथा थई । पावापुरी प्रतिष्ठाना संस्मरणो आंख सामे तरवरवा लाग्या । आवा अध्यात्ममूर्तिना काळधर्मना समाचार सौने व्यथा पहोंचाडे पण तमो बधा तो तेओश्रीनी वाणीमा स्नान करी नीतरी रह्या छो । वैराग्यभावनी ज्योतमां आ आघातने पचावी तेओश्रीना मार्गे आगळ वधी खूब-खूब शासन प्रभावना साथे स्वकल्याणना मार्गे आगळ वधो । - एज... अशोकसागरसूरिनी अनुवंदना म.सु. ४, सुरत. १०८ ****************************** कहे
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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