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________________ - वांकी (कच्छ) चातुर्मास प्रवेश, वि.सं. २०५ ३०-७-१९९९, शुक्रवार श्रा. व. २ भगवान ने तीस वर्ष तक तीर्थ को स्थिर करने के लिए निरन्तर छ: छः घंटों तक सतत देशना दी, क्योंकि मनुष्य की भूलने की प्रकृति है । उसे पुनः पुनः स्मरण कराने पर भी वह पुनः पुनः भूल जाता है। इसी लिये पुनरावृत्ति को इतना महत्त्व दिया जाता है। पढा हुआ क्यों भूल जाते हैं ? क्योंकि पुनरावृत्ति नहीं की। जब आप पढते हैं तब कुछ ज्ञानावरणीय टूटते हैं, परन्तु शेष समय में क्या होता है ? ज्ञानावरणीय निरन्तर बंधते ही रहते है, अतः हम पढते हैं उससे अधिक भूल जाते हैं । - दीक्षा ग्रहण करने से पूर्व कितने उत्तम मनोरथ थे ? अब उन्हें हम कैसे भूल गये? इसी लिए पांचों आचारों का सतत पालन करना है, परन्तु जब तक क्षायिक भाव न आये तब तक पालन करना है । क्षायोपशमिक भावों की तो सतत सुरक्षा करनी ही रही । वे कब चले जायें, कुछ कहा नहीं जा सकता । * गुरु के पास शास्त्रों का अध्ययन करने का मुख्य कारण यह हैं कि उसके द्वारा स्व-दोष ध्यान में आते हैं । स्व-दोष दर्शन कहे कलापूर्णसूरि - १ ***** ******************************
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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