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________________ आपत्ति के समय में भी अविषादी । इतने गुण तो गुरु में होने ही चाहिये । अब दीक्षार्थी के १६ गुण : २. १. आर्यदेश में उत्पन्न अर्थात् बीज आर्य भूमि का हो । शुद्धजाति कुलान्वित : माता की जाति, पिता का कुल दोनों उत्तम होने चाहिऐ । मनुष्य बहुत है परन्तु सभी उत्तम नहीं होते । नीच कुल के, अनार्यदेश के मनुष्यों में सहज ही योग्यता अल्प होती है । ३. विमल बुद्धि : - रत्नों का मूल्यांकन बुद्धिहीन व्यक्ति नहीं कर सकता । निर्मल बुद्धिवाले की विचार धारा निर्मल होती है। उसकी विचार धारा से ही निर्मलता का पता चलता है । (दीक्षार्थी के १६ गुण के लिए देखे आषाढ शुक्ला सप्तमी का व्याख्यान) निर्मल बुद्धिवाला व्यक्ति ही मानव- जन्म - - दुर्लभता आदि का विचार कर सकता है । मानव-जन्म की दुर्लभता अन्य गतियों को देखने से ही समझ में आती है । देवगति पुन्य एवं नरक गति पाप भोगने के लिए हैं । देवगति में भी दुर्गति होती हैं, ईर्ष्या, विषाद, अतृप्ति होती हैं । तिर्यंच गति तो नजर के सामने ही दुःखमय है । अब केवल मनुष्य के पास ही धर्म की योग्यता रही । इस कारण ही मोह मनुष्य को फंसाने के लिए कंचन - कामिनी आदि का जाल फैलाता है। पतंगे को दीपक में स्वर्ण प्रतीत होता है, मनुष्य को पीली मिट्टी में सोना दृष्टिगोचर होता है । स्वर्ण मिट्टी ही है, तत्त्वद्रष्टाओं के लिए दोनों एक ही हैं । आपका जीवन सम्पूर्णतः धन-केन्द्रित है । आप धन के आसपास घूमते हैं । यहां आप आते अवश्य हैं, परन्तु आपका मन तो धन में ही होता हैं । अनेक व्यक्ति तो यहां आकर कह जाते हैं, 'महाराज ! महाराज ! मेरे इस पाकीट का ध्यान रखना ।' साधु आपके पाकीट का ध्यान नहीं रखेंगे । शायद कोई उठा ले जाये तो नाम साधु का आयेगा । (मद्रास में ऐसे ठग कभी कभी आ जाते थे कि वन्दन करते समय कोई पाकीट नीचे रखे और ठग तुरन्त उसे उठा कर चल देते, मालिक को पता ही नहीं कहे कलापूर्णसूरि १ * **** ६५
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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