SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 118
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ लगता था ।) वैराग्य के लिए संसार की निर्गुणता जाननी पड़ती है। उसके लिए यह विचार करना चाहिए कि संयोग का वियोग होने वाला ही हैं । मृत्यु सामने ही खड़ी हैं । विषय दुःखदायी हैं । यदि मैं जीवन का सदुपयोग नहीं करूंगा तो भयंकर परिणाम भोगने पड़ेंगे । इस प्रकार की विचारधारा से जिसने संसार की निर्गुणता जानी हैं, वह दीक्षा के लिए योग्य बनता हैं। संसार आपको सारभूत लगता हैं, ज्ञानियों को असार लगता हैं । संसार आपको गुणपूर्ण लगता हैं, ज्ञानियों को निर्गुण लगता * जीव की पांच शक्तियां : १. अमरता, २. वाणी की अमोघता, वाणी ज्ञान की द्योतक हैं अर्थात् अमोघ ज्ञान, ३. आत्मा का ज्ञान आदि ऐश्वर्य, ४. अजन्मा स्वभाव, ५. अक्षय स्थिति । उसका पांच अव्रत हनन करते हैं । अन्य को मारने से हम 'अमरता' का हनन करते हैं । असत्य बोलने से 'अमोघ वाणी' (अमोघ ज्ञान) का हनन करते हैं। चोरी करके 'अनन्त ऋद्धि' का हनन करते हैं । अब्रह्म से 'अजन्मा' स्वभाव का हनन करते हैं । अन्य को जन्म देने से । परिग्रह से अक्षयस्थिति गुण का हनन करते हैं । * क्रोधादि, कामादि, हास्यादि से दीक्षार्थी पर होते हैं । वह कृतज्ञ होता हैं, किये हुए को भूलता नहीं हैं । अन्य व्यक्ति के ऋण को स्वीकार करे वही परोपकार में प्रवृत्त हो सकता हैं । किसी के पास धन उधार लो तो उसका उपकार मानोगे कि नहीं ? या ऋण लेकर बैठ जाओगे ? यदि उपकार नहीं मानोगे तो 'नगुणे' कहेलाओगे । धन उधार देनेवाले के उपकार मानते हो तो ज्ञान प्रदान करने वाले गुरु का क्या उपकार नहीं मानोगे ? निगोदमें से किसी सिद्ध भगवंत ने हमें बाहर निकाला हैं । अब जहां तक हम मोक्ष में जाकर अन्य जीव को निगोद में से कहे कलापूर्णसूरि - १ ६६ ****************************** का
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy