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________________ बैठने की प्रतिज्ञा की बात सुनकर वे आश्चर्य व्यक्त करते । मांसाहारी एवं शराबी (मदिरा - पायी) होते हुए भी सद्गुरुओं के प्रति उनमें अपार बहुमान । हृदय के सरल । समझाने पर तुरन्त मांस आदि छोड़ने के लिए तैयार हो जायें । जिस प्रकार का विज्ञान शिष्य गण गुरु से ग्रहण करें उससे उनका मोक्ष मार्ग खुला हो जाये, प्रयाण में आगे बढे । जो ऐसे हों उन्होंने अपना गुरु पद सफल बनाया हैं । = महान । लघु = छोटा, हलका । गुरु उत्तम जीवन जीकर गुरु 'गुरु' शब्द को सार्थक करते हैं । गुरु के समस्त गुणो में 'अनुवर्तक' गुण को अत्यन्त ही महत्त्व दिया गया हैं ताकि शिष्य उत्तम प्रकार से तैयार हो सकें । प्रेरणा, इच्छा, प्रयत्न आदि बहुत होने पर भी यदि शिष्य तैयार न हों तो गुरु दोष के भागी नहीं होते । गुरु ने उसके लिए पूर्णत: परिश्रम कर लिया हैं । भगवान महावीर के समय में जमाली ने स्वयं भगवान का नहीं माना । भगवान क्या कर सकते हैं ? गुरु क्या कर सकते हैं ? वे प्रेरणा उपदेश आदि हित- शिक्षा दे सकते हैं, परन्तु अगले व्यक्ति ने उनकी बात नहीं मानने का ही निश्चय किया हो तो ? तो फिर गुरु पर कोई दोष नहीं हैं । आखिर गुरु की भी कोई मर्यादा होती है । प्रश्न : अपराध शिष्य का, गुरु को किस बात का पाप ? जो करेगा वह भोगेगा । - उत्तर : आज्ञा भंग होने से दोष लगता है । शिष्य का पाप गुरु को लगे यह बात नहीं हैं, परन्तु भगवान की आज्ञा के उल्लंघन का दोष लगता हैं । जो व्यक्ति आज्ञा पालन करने योग्य न हो उसे पहले से ही गुरु दीक्षा का इनकार कर दें कि मैं आपको सम्हालने में असमर्थ हू । इनकार करने के लिए अत्यन्त ही सत्त्व चाहिये । गुरु की जघन्य योग्यता : सूत्रार्थ विज्ञ, साध्वाचार के पालक, शीलवान, क्रिया-कलापों में कुशल, अनुवर्तक, शिष्य का ध्यान रखने वाले प्रति जागरुक, ६४ ****** ********* कहे कलापूर्णसूरि- १
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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