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________________ कच्छ) चातुर्मास प्रवेश, वि.सं. २०५५ २०-७-१९९९, मंगलवार आषा. सु. ८ मैंने तीस वर्ष की आयु में दीक्षा अंगीकार की । संस्कृत का यदि मैं ने अध्यन नहीं किया होता तो ? शायद भाषान्तर से मूल शब्दों का ही विचारों के कारण चलाना पड़ता । भाषान्तर अर्थात् बासी माल । क्यों न अध्ययन किया जाये ? इस प्रकार के ही मैं ने संस्कृत का अध्ययन किया । पू. आत्मारामजी म. स्थानकवासी श्रावक के व्यंग्य से ही संस्कृत का अध्ययन करने के लिए प्रेरित हुए थे । श्रावक के साथ पू. आत्मारामजी का वार्तालाप : श्रावक : 'आपकी पढाई कितनी हुई ?' आत्माराजजी : 'पढाई पूर्ण हो गई ।' 'ज्ञान कभी पूरा होता है ? यह तो कूपमण्डूक जैसी बात हुई । ज्ञान कदापि पूरा नहीं हो सकता ।' इस वार्तालाप से संस्कृत अध्ययन का उत्साह जागृत हुआ । गुरु ने कहा, 'व्याकरण के अध्ययन से मिथ्यात्व लगता है । ' 'भले ही लगे, परन्तु अध्ययन तो करना ही है ।' अध्ययन किया, सच्चा अर्थ जान कर सुमार्ग पर आये । ******* कहे कलापूर्णसूरि - १ ५० *****
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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