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________________ १७ साधुओं के साथ संवेगी में आये । स्थानकवासी वेष में रहकर भी भयंकर विरोध के बीच भी मूर्ति का प्रचार किया । मैं यह कहना चाहता हूं कि छोटी उम्र हो तो संस्कृत आदि के अध्ययन में प्रमाद न करें । थोड़ा कठिन लगा और तुरन्त छोड़ देना, यह वृत्ति ठीक नहीं है । आप जो सीखे हुए हों वह थोड़ी भी कृपणता किये बिना अन्य को देते रहें । स्वयं सीखा हुआ दूसरों को सिखाने से ही अमुक अंशों में ऋण से मुक्त हो सकते हैं । गुरु के गुण - ४. निर्मल बोधः । ५. वस्तुतत्त्ववेदी : बोध भिन्न है, संवेदन भिन्न है। संवेदन अर्थात् अनुभूति । अध्यात्मगीता में - 'वेदी' शब्द का प्रयोग हुआ है । वेदन करना अर्थात् अनुभव करना । 'वस्तुतत्त्ववेदी' अर्थात् आत्म-तत्त्व का वेदन करनेवाले । ६. उपशान्तः क्रोधविपाकावगमेन - क्रोध का फल जानकर सदा शान्त रहनेवाले । समतानन्द का ज्ञाता भला क्रोध क्यों करेगा ? ७. प्रवचन-वत्सलः : चतुर्विध संघ के प्रति भरपूर वात्सल्य हो, तो ही आगन्तुक शिष्य पर वात्सल्य की वृष्टि कर सके । पू. कनकसूरि महाराज में हमने यह गुण देखा है। यहां गुरु को मातापिता दोनों का कर्तव्य निभाना है । वात्सल्य के बिना आनेवाला शिष्य टिक नहीं सकता । ८. सर्वजीवहितरतः : पुद्गल के प्रति कोई रति नहीं, परन्तु सबके हित की रति । उसके बिना रहा नहीं जा सकता । ९. 'परहितचिन्ता मैत्री, पर दुःख विनाशिनी करुणा' : इत्यादि ४ भावना जीवन में उतारने से स्व-पर का सच्चा हित पूर्ण होता है । हितकर प्रेरणा के समय भी यदि वह उद्धत बने तो मौन रहे । १०. आदेयवचनः जिनके वचनों को सब शिरोधार्य करें वैसा पुण्य । ११. अनुवर्तकः भावानुकूल्येन सम्यक् पालकः । शिष्य कहे कलापूर्णसूरि - १ ****************************** ५१
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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