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________________ ५ हो गया हो । विमलबुद्धिः : निर्मल बुद्धिवाला हो । दुलर्भं मानुषं जन्म, जन्म मरणनिमित्तम्, चपलाः सम्पदः, विषयाः दुःखहेतवः, संयोगाः विप्रयोगान्ताः, प्रतिक्षणं मरणम्, दारुणो विपाकः इति अवगतसंसारनैर्गुण्यः - संसार की निर्गुणता का ज्ञाता हो । ६. तद्विरक्तः : संसार से विरक्त हो । प्रतनुकषायः : अल्प कषायी । अल्पहास्यः : अल्प हास्ययुक्त । कृतज्ञः : कृतज्ञता एवं परोपकार विश्व के सबसे बड़े गुण हैं । अन्य के उपकार को स्वीकार करना-मानना वह कृतज्ञता है । अन्य पर उपकार करना वह परोपकार है । १०. विनीतः : दीक्षार्थी का सबसे बड़ा गुण विनय है । ११. राजादिप्रधानपुरुषसम्मतः : राजा आदि महापुरुषों से, सम्मानीय व्यक्ति दीक्षा ग्रहण करें तो शासन प्रभावना सुन्दर होती है । १२. अद्रोहकारी : किसी का भी द्रोह न करे वह गुरु का द्रोह थोड़े ही करेगा ? गुरु को छोड़ कर वह चला नहीं जायेगा । प्रमत्त अवस्था में भी शैलक गुरु को पंथक ने छोड़ा नहीं था । १३. कल्याणाङ्गः : रूपवान्, भद्र ।। १४. श्राद्धः : श्रद्धालु । १५. स्थिरः : स्थिरमति । १६. समुपपन्नः : गुरु को समर्पित हो । इस तरह गुणपूर्वक सविधि दीक्षा अंगीकार की हो, वही गुरु बन कर दीक्षा प्रदान कर सकता है । गुरु का यह प्रथम गुण है । २. विधिपूर्वक - गृहीत - प्रव्रज्यः : विधिपूर्वक प्रव्रज्या ग्रहण करनेवाले। ३. सेवित - गुरुकुलवासः : गुरु कुलवासी । गुरुकुल वास से समस्त गुण खिलते हैं । गुरु को छोड़ने के बाद कोड़ि का भी मूल्य नहीं है । मछलियां सागर में टकराने ४८ ****************************** कहे
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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