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श्रीमद्भगवद्गीता शुभ्र ज्योतिः देखनेमें आती है; वही "श्वत अश्व" है, वह ज्योतिः तत्क्षणात् चार टुकड़े होकर दाहिने, बायें, ऊंचे, नीचे की तरफ विद्यु - द्वगकी तरह दिखाई देके हट जाती है। उसी ज्योतिके बाद (हृदयमें ) अखण्ड मंडलाकार घोर कृष्णवर्ण पद दिखाई देता है। वही "माधव” (
मालक्ष्मी, सत्वगुणा महाशक्ति [प्रकाश] +धव= पति [कृष्ण ] अर्थात् महत् प्रकाश जिसकी गीदमें बैठ कर प्रकाशित होते हैं, वही माधव हैं)। अन्तमें साधकको इस कृष्ण वर्ण मण्णालके पश्चात् (भीतर) एक अधिकतर उज्ज्वल गहरा कृष्णवर्ण विन्दु देख पड़ता है; वही बिन्दु "पाण्डव” (अर्जुन) हैं। इस प्रकार देखते-देखते मन जब निष्पन्द हो जाता है, तब एक आकाशव्यापी शब्दका उत्थान होता हैवह शब्द केसा और उसका उत्पत्ति स्थान भी किस प्रकारका है, इसके उपरान्तके श्लोकमें वह कहा जाता है ॥ १४ ॥
पांचजन्यं हृषोकेशो देवदत्तं धनंजयः। पौण्ड् दध्मौ महाशंख भीमकर्मा वृकोदरः ॥१५॥ अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥ १६ ॥ काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः । धृष्टद्य म्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥ १७ ॥ द्र पदौ द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
सौभद्रश्च महाबाहुः शंखान्दध्मुः पृथक पृथक् ॥१८॥ अन्वयः। ह्रषीकेशः पांचजन्यं ( शङ्ख ), धनंजयः देवदत्त ( शंख ) भीमका वृकोदरः ( भीमः ) महाशंखं पौण्ड्र दध्मौ; कुन्तीपुत्रः राजा युधिष्ठिरः अनन्तविजयं (शंखं) दध्मौ; नकुलः सहदेवश्च सुधोषमणिपुष्पकौ ( शङ्खो दध्मतुः ); हे पृथिवीपते । परमेष्वासः काश्चश्च ( काशीराजः ), महारथः शिखण्डी च, धृष्टद्युम्नः, विराटश्च, अपराजितः सात्यकिश्च, द्रु पदः द्रौपदेयाश्च, महाबाहुः सौभद्रश्च, सर्वशः ( सर्वे एव ) पृथक् पृथक् शङ्खान् दध्मुः ॥ १५ ॥ १६ ॥ १७ ॥ १८॥