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ब्रह्म
लस
साधन प्रकरण साधनसमर-क्षेत्र षट्चक्रमें प्राणकिया (प्राणायाम ) द्वारा प्राणप्रवाहको सूक्ष्म और स्थिर करनेसे, मन आज्ञामें आरूढ़ होकर शान्तभावसे निष्क्रियपद परागतिमें जिस क्रमानुसार उठ जाता है, वह उपनिषदमें व्यक्त है; यथा
"इन्द्रियेभ्यः पराह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः। मनसस्तु परा बुद्धिबुद्धरात्मा महान् परः॥ महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषो परः।
पुरुषान्न परं किञ्चित् सा काष्ठा सा परागति ॥" (४र्थ चित्र देखो)। प्राणायाम द्वारा इन्द्रिय समूह निगृहित होनेसे 'अर्थ' अर्थात् सूक्ष्म तन्मात्रा . ४र्थ चित्र वा अन्तावषयका विकाश होता ह; इसी समयसे मनबुद्धि-अहंकार-चित्तके आवरण धारे धीर लय-प्राप्त होता रहता है, और प्रत्येक प्राक्रणम उस सवव्यापी अद्वितीय सर्वशक्ति कारणसे विविध प्रकार निर्वचनीय क्रियाशक्तिका विकाश होता। ह (४थं अः ५म और म श्लोकका व्याख्या देखो)। __ मस्तक-प्रन्थिसे भूमध्यमें मनके द्वारा स्थिरभाक्से दृष्टि निक्षेप करनेसे वहां जो
चिदाकाश
निदान
मत वित