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________________ निसीहज्झयणं १०३ पच्चप्पण-पदं प्रर्त्यपण-पदम् १५. जे भिक्खू पाडिहारियं पायपुंछणयं यो भिक्षुः प्रातिहारिकं पादप्रोञ्छनकं जाइत्ता 'तमेव रयणिं याचित्वा तस्यामेव रजन्यां पच्चप्पिणिस्सामित्ति सुए प्रत्यर्पयिष्यामीति' श्वः प्रत्यर्पयति, पच्चप्पिणति, पच्चप्पिणंतं वा प्रत्यर्पयन्तं वा स्वदते । सातिज्जति॥ उद्देशक ५ : सूत्र १५-२१ प्रत्यर्पण-पद १५. जो भिक्षु प्रातिहारिक पादप्रोञ्छन की 'उसी रात्रि को (आज रात को) लौटाऊंगा'-इस संकल्प के साथ याचना करता है, उसे कल (दूसरे दिन) लौटाता है अथवा लौटाने वाले का अनुमोदन करता है। १६.जे भिक्खू पाडिहारियं पायपुंछणयं यो भिक्षुः प्रातिहारिकं पादप्रोञ्छनकं जाइत्ता 'सुए पच्चप्पिणिस्सामित्ति' । याचित्वा 'श्वः प्रत्यर्पयिष्यामीति' तमेव रयणि पच्चप्पिणति, तस्यामेव रजन्यां प्रत्यर्पयति, प्रत्यर्पयन्तं पच्चप्पिणतं वा सातिज्जति॥ वा स्वदते। १६. जो भिक्षु प्रातिहारिक पादप्रोञ्छन की 'कल लौटाऊंगा'-इस संकल्प के साथ याचना करके उसी रात को लौटा देता है अथवा लौटाने वाले का अनुमोदन करता है। १७. जे भिक्खू सागारिय-संतियं यो भिक्षुः सागारिकसत्कं पादप्रोञ्छनकं पायपुंछणयं जाइत्ता 'तमेव रयणिं याचित्वा तस्यामेव रजन्यां पच्चप्पिणिस्सामित्ति' सुए प्रत्यर्पयिष्यामीति' श्वः प्रत्यर्पयति, पच्चप्पिणति, पच्चप्पिणंतं वा प्रत्यर्पयन्तं वा स्वदते। सातिज्जति॥ १७. जो भिक्षु शय्यातर-निश्रित पादप्रोञ्छन की 'उसी रात्रि को लौटाऊंगा'-इस संकल्प के साथ याचना करके कल लौटाता है अथवा लौटाने वाले का अनुमोदन करता है। १८. जे भिक्खू सागारिय-संतियं । यो भिक्षुः सागारिकसत्कं पादप्रोञ्छनकं १८. जो भिक्षु शय्यातर-निश्रित पादप्रोञ्छन की पायपुंछणयं जाइत्ता 'सुए याचित्वा 'श्वः प्रत्यर्पयिष्यामीति' 'कल लौटाऊंगा' इस संकल्प के साथ पच्चप्पिणिस्सामित्ति' तमेव रयणिं तस्यामेव रजन्यां प्रत्यर्पयति, प्रत्यर्पयन्तं याचना करके उसी रात को लौटा देता है पच्चप्पिणति, पच्चप्पिणंतं वा वा स्वदते । अथवा लौटाने वाले का अनुमोदन करता सातिज्जति॥ १९. जे भिक्खू पाडिहारियं दंडयं वा यो भिक्षुः प्रातिहारिकं दण्डकं वा यष्टिका १९. जो भिक्षु प्रातिहारिक दंड, लाठी, लट्ठियं वा अवलेहणियं वा वेणुसूई वा अवलेखनिकां वा वेणुसूची वा याचित्वा अवलेखनिका अथवा वेणुसूई की 'उसी रात्रि वा जाइत्ता 'तमेव रयणिं 'तस्यामेव रजन्यां प्रत्यर्पयिष्यामीति' श्वः को लौटाऊंगा'-इस संकल्प के साथ याचना पच्चप्पिणिस्सामित्ति' सुए प्रत्यर्पयति, प्रत्यर्पयन्तं वा स्वदते । करके कल लौटाता है अथवा लौटाने वाले पच्चप्पिणति, पच्चप्पिणंतं वा का अनुमोदन करता है। सातिज्जति॥ २०. जे भिक्खू पाडिहारियं दंडयं वा लट्ठियं वा अवलेहणियं वा वेणूसूई वा जाइत्ता 'सुए पच्चप्पिणिस्सामित्ति' तमेव रयणि पच्चप्पिणति, पच्चप्पिणंतं वा सातिज्जति॥ यो भिक्षुः प्रातिहारिकं दण्डकं वा यष्टिकां २०. जो भिक्षु प्रातिहारिक दंड, लाठी, वा अवलेखनिकांवा वेणुसूची वा याचित्वा अवलेखनिका अथवा वेणुसूई की 'कल 'श्वः प्रत्यर्पयिष्यामीति' तस्यामेव रजन्यां लौटाऊंगा' इस संकल्प के साथ याचना प्रत्यर्पयति, प्रत्यर्पयन्तं वा स्वदते । करके उसी रात्रि को लौटा देता है अथवा लौटाने वाले का अनुमोदन करता है। २१. जे भिक्खू सागारिय-संतियं दंडयं यो भिक्षुसागारिकसत्कं दण्डकं वा यष्टिका २१. जो भिक्षु शय्यातरनिश्रित दंड, लाठी,
SR No.032459
Book TitleNisihajjhayanam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTulsi Acharya, Mahapragya Acharya, Mahashraman Acharya, Srutayashashreeji Sadhvi
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year2014
Total Pages572
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_nishith
File Size16 MB
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