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________________ १७४ भारतीय संस्कृतिके विकासमें जैन वाङ्मयका अवदान जैनधर्म निवृत्ति प्रधान धर्म है इसमें इतर धर्मोकी अपेक्षा अनेक विशेषताएँ हैं । धर्मकी विशेषता के कारण जैन धर्मानुयायी कलाकारोंकी अभिव्यञ्जनामें भी पर्याप्त अन्तर है । यदि प्रतीकों के भेद से या अन्तर्जगत्के भावविशेषको व्यक्त करनेकी प्रणालीके भिन्न होनेसे जैनकलाको अलग स्थान दिया जाय तो अनुचित न होगा । जैन आदर्श वीतरागताका है, इसलिये जेन कलाकार प्रत्येक ललित कलामें इसी आदर्श की अभिव्यञ्जना करता है । उसका ध्येय कला द्वारा लौकिक एषणाकी तृप्ति करना नहीं होता, किन्तु शान्तरसका प्रवाह बहाकर द्रष्टाके हृदय में आध्यात्मिक भावनाको जागृत करना है । जैन कलाकारोंने पत्थर या कागजके माध्यम द्वारा आध्यात्मिक रहस्यके उद्घाटनमें आशातीत सफलता प्राप्त की है । अभिव्यञ्जनाकी दृष्टिसे जैनकलाके दो भेद किये जा सकते हैं -- स्थित कला (The Static Mood of art ) और गतिशील कला (The dynamic mood of art ) । प्रथममें क्रम और औचित्यकी प्रधानता तथा द्वितीयमें गति, आरोहावरोह एवं भावव्यञ्जनाकी प्रधानता रहती है | स्थित कला वास्तु, तक्षण और चित्र ये तीन भेद एवं गतिशील कलाके संगीत और काव्य ये दो भेद हैं । वास्तुकला — इस कलामें कलाकार लोहा, पत्थर, लकड़ी और ईंट आदि स्थूल पदार्थोंके सहारे अपने अमूनिक भावोंके सौन्दर्यकी अभिव्यञ्जना करता है । जैनोंने इस कलामें प्राचीनकाल से ही अधिक उन्नति की है। गिरनाट' ने हिन्दुकलाके बहुत से स्थापत्योंमें जैन कलाका पूर्ण प्रभाव बताया है । जहाँ तक वास्तुकलाका सम्बन्ध है जैनकला अद्वितीय है । वास्तुकला में जैनधर्मकी सुन्दर अभिव्यक्ति की गई है । विशाल पर्वतोंपर प्रकृतिके रम्य वातावरण में श्रेष्ठ मन्दिरोंका निर्माण कर जैनोंने वस्तुतः अपनी कलाप्रियताका परिचय दिया है । श्री सम्मेदशिखर ( Parshwnath Hill गिरनार और शत्रुञ्जयके निर्जन प्रदेशोंकी जैन स्थापत्य कला अपनी आभा और चमकसे प्रत्येक दर्शकके मनको बरबस अपनी ओर खींच लेती है । 1 ), प्राचीन भारतकी स्थापत्य कलामें मथुराका जैनस्तूप भी शिल्पतीर्थंका सर्वोत्कृष्ट नमूना है । यहाँके रमणीय देवप्रासाद, उनके सुन्दर तोरण, वेदिकास्तम्भ, उष्णीष पाषाण, उत्फुल्ल कगलोंसे सुसज्जित सूची, उत्कीर्ण आयागपट्ट आदि जैनकलाके गौरव । चहार दीवारी के वेदिका-स्तम्भोंपर अनेक सुगात्रवाली नर्तिकाएँ अंकित हैं, जो मथुराकलाकी अनुपम देन है । इन रमणियोंके सुन्दर रत्नजटित वस्त्राभूषणोंकी कारीगरोंको देखकर दाँतों तले अंगुली दबानी पड़ती है । चम्पक, आम्र, अशोक और बकुलके उद्यानोंमें क्रीडासक्त अथवा स्नान और प्रसाधन द्वारा श्रृंगारमग्न देवियोंको देखकर जैनकलाका गौरव सहज ही हृदयंगम हो जाता है । इन वेदिकाओंको सुपर्ण और किन्नर देवोंके पूजा दृश्योंने और भी रमणीय और भावगम्य बना दिया है । बौद्ध स्तूपके पास जो दो बड़े देवप्रासादोंके भग्नावशेष उपलब्ध हुए हैं, 1. Guerinat, Lo Relgion Dgaina, p. 279; 2. Fergusson, History of Indian and Eastern Architecture, ii, p. 24. 3. Elliot, Hinduism and Buddism i, P. 121.
SR No.032458
Book TitleBharatiya Sanskriti Ke Vikas Me Jain Vangamay Ka Avdan Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Shastri, Rajaram Jain, Devendrakumar Shastri
PublisherPrachya Shraman Bharati
Publication Year2003
Total Pages478
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size13 MB
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