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________________ 96 जैन श्रमण : स्वरूप और समीक्षा संभावना करना भी गलत है, हमें इस सन्दर्भ में सूक्ष्मता से आ. सोमदेव के भावों को पहिचानना होगा -जहाँ के उद्धरण दिये जाते हैं -देखें "काले कलौ चले चित्ते देहे चान्नादिकीटके। एतच्चित्रं यदद्यापि जिनरूपधराः नराः ।। 796 ।। यथा पूज्यं जिनेन्द्राणां रूपं लेपादि निर्मितम् तथा पूर्व मुनिच्छाया पूज्याः संप्रति संयताः ।। 797 ।। उपासकाध्ययन इस श्लोक की संस्कृति टीका में पं.श्री जिनदास जी श्लोकार्थ को स्पष्ट करते हैं कि-"पंचम कालेऽपि जैन मुनयः विहरन्तीति निगदत्ति-काले इति-अस्मिन्कलौ काले दुःखमाख्ये पंचमकाले। चले चित्ते मनसि चंचले सति। देहे शरीरे च अन्नादिकीटके अन्नम् अत्तीति भक्षयतीति अन्नादी स चासौ. कीटकः तस्मिन् सति। एतच्चित्रम् आश्चर्यं विद्यते यत् अद्यापि जिनरूपधारिणः नराः विद्यन्ते। अयं पंचमकालः शुभो नास्ति यतः सर्वे जनाः स्वेराचारपरायणाः पापरता दृश्यन्ते। चित्रमपि चलं धर्माचरणाद् पेतुमिच्छति। देहोऽपि अन्नाभिलाषरतः, तथापि अत्र भारत केचन जना जिनेन्द्रमुद्रांधृत्वा स्वपरहिताय यतन्त।। 796 ।। यथेति-यथा लेपादि निर्मितं काष्ठपाषाण मण्यादिविरचितं जिनेन्द्राणां रूपं जिन प्रतिबिम्बं पूज्यम्। तथा पूर्वमुनिच्छायाः पूर्वे ये मुनयः पूर्वमुनयस्तेषां छाया यत्र तत्सदृशा इत्यर्थः । अष्टाविंशतिमूलगुणधारिणः संयताः संप्रति अस्मिन् काले पूज्याः मान्याः । परं यदि स्वाचारात् भ्रष्टा गृहस्थवत् असत्यं ब्रुवन्ति, मान्यान् मुनीनपि न मानयन्ति अहमपि न तेम्यो हीनः इति ये मन्यन्ते। न ते नमस्कार योग्याः ये च तान्नमस्यन्ति ते तत्पापम् अनुमन्यमाना ज्ञातव्याः। ----पूर्व मुनिच्छाया इत्यत्र छायाशब्दः अल्पत्वद्योतकः तच्च अल्पत्वं मुनिचारित्रापेक्षया पूर्वेमुनयः तपस्विनः परीषहोपसर्गान् सहमाना आसन् नाधुना ते तथा हीन संहननधारित्वात्। परन्तु हीन संहननेऽपि मूलगुणानां पालनं भवत्येव अतः मूलगुणलोपाकारिणः मुनयः पूर्वमुनिच्छाया ज्ञातव्याः ।। 797 ।। उपर्युक्त संस्कृत टीका का भाव है कि इस पंचम काल में भी विचरते श्रमण एक आश्चर्य हैं, जबकि मनुष्य शरीर का गुलाम बना हुआ है। यह पंचम काल अच्छा काल नहीं है। सभी अपने आचरण से हीन हैं तथापि जिनेन्द्रमुद्रा को धारण करने वाले हैं। अतः इन वर्तमान श्रमणों पर पूर्वमुनियों की छाया मानकर अर्चना करना चाहिए। परन्तु यहाँ यह तात्पर्य नहीं कि हर किसी पर पूर्व मुनि की छाया मान ली जावे, अपितु जो अट्ठाइस मूलगुणों में सजग हैं, सच्चे मुनि हैं परन्तु हीन संहनन होने से एक-एक मास के उपवास नहीं कर सकते हैं। गर्मियों के समय पहाड़ों पर जाकर उग्र तपस्या नहीं कर सकते हैं, परन्तु "ज्ञानध्यानतपोरक्तः" हैं ऐसे मुनियों पर ही पूर्व मुनियों की प्रतिकृति मानकर पूजना चाहिए।
SR No.032455
Book TitleJain Shraman Swarup Aur Samiksha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYogeshchandra Jain
PublisherMukti Prakashan
Publication Year1990
Total Pages330
LanguageHindi
ClassificationBook_Gujarati
File Size25 MB
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