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२२. ध्यान सूत्र
२५५. सीसं जहा सरीरस्स, जहा मूलं दुस्स य । सव्वस्स साधुधम्मस्स, तहा झाणं विधीयते ॥१॥ जैसे शरीर में सिर और वृक्ष में उसकी जड़ मुख है, वैसे ही साधु के समस्त साधु-धर्मों का मूल ध्यान है ।
૨૨. ધ્યાન સૂત્ર
૨૫૫. જેમ શરીરમાં મસ્તક અને વૃક્ષમાં એવું થડ (મૂળ) મુખ્ય છે તેમ સાધુતા બધા સાધુધર્મમાં ધ્યાત મૂળ છે.
22. DHYAN SOOTRA
255. Just as, head is the main organ of a body and trunk is the root of a tree, so is dhyan meditation is root of monk's all duties.
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२५६. जं थिरमज्झवसाणं तं झाणं जं चलंतयं चित्तं । तं होज्ज भावणा वा, अणुपेहा वा अहव चिंता ॥ ३ ॥
स्थिर अध्यवसान अर्थात् मानसिक एकाग्रता ही चित्त की जो चंचलता है उसके तीन रूप है अनुप्रेक्षा और चिन्ता ।
ध्यान है ।
भावना,
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૨૫૬, સ્થિર અધ્યવસાય અર્થાત્ માતસિક એકાગ્રતા જ ધ્યાત છે. यित्तनी यंयजतानां त्रण ३प छे - भावना, अनुप्रेक्षा, चिंता.
256. Dhyan is stable reflection of the soul means mental concentration. There are three forms of unsteady mind, emotions, spiritual pondering and worries.
वीतराग वैलव