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________________ स्वसमय वक्तव्यताधिकारः अनुवाद इतर दर्शनवादी जो असम्यग्दृष्टि हैं, आर्य गुणों-उत्तम गुणों से रहित हैं वे इस अर्थ या तथ्य को यथावत नहीं समझ पाते, वे फंदे में फंसे हिरण की ज्यों अनन्त बार घात प्राप्त करते हैं- जन्म मरण में आते जाते हैं । टीका - भूयोऽप्यज्ञानवादिनां दोषाभिधित्सयाऽऽह येऽज्ञानपक्षं समाश्रिता एनं कर्मक्षपणोपायं न जानन्ति, आत्मीयाऽसद्ग्रहगस्ता मिथ्यादृष्टयोऽनार्य्यास्ते मृगा इव पाशबद्धाः घातं विनाशमेष्यन्ति यास्यन्त्यन्वेषयन्ति वा, तद्योग्यक्रियानुष्ठानाद् अनन्तशोऽविच्छेदेनेत्यज्ञानवादिनोगताः ॥१३॥ टीकार्थ आगमकार अज्ञानवाद में विश्वास करने वाले और उसका प्रतिपादन करने वाले लोगों के दोष बताते हुए प्रतिपादन करते हैं - - - जो मनुष्य अज्ञान के पक्ष का आश्रय लिये रहते हैं, जो कर्मक्षपण-कार्यनाश के उपाय-संवर निर्जरात्मक धर्मसाधना को नहीं जानते, विपरीत सिद्धान्तों के साथ दुराग्रहपूर्वक जुड़े रहते हैं, जो असम्यग्दृष्टि हैं, आर्यगुण रहित हैं वे अनन्त काल पर्यन्त अनन्ताबार उसी प्रकार विनाश को प्राप्त करते हैं जैसे पाशबद्ध- फंदे में बंधा हुआ मृग घात - विनाश योग्य कर्म का अनुसरण कर घात या विनाश को प्राप्त करता है। वे अज्ञानवादी ऐसे हैं । माहणा समणा एगे, सव्वे सव्वलोगेऽवि जे पाणा न ते - छाया ब्राह्मणाः श्रमणा एके सर्वे ज्ञानं स्वकं वदन्ति । सर्वलोकेऽपि ये प्राणाः न ते जानन्ति किंचन ॥ - नाणं सयं वए । जाणंति किंचण ॥१४॥ अनुवाद कई ब्राह्मण परम्परा से जुड़े हुए पुरुष तथा कई श्रमण परम्परा से संबद्ध जन सभी अपना अपना ज्ञान प्रतिपादित करतेहैं । अपने अपने ज्ञान को विशेष रूप से व्याख्यात करते हैं । वे ऐसा मानते हैं कि समस्त लोक में प्राणीवृन्द हैं उनमें कुछ भी ज्ञान नहीं है - वे कुछ भी नहीं जानते । टीका - इदानीमज्ञानवादिनां दूषणोद्विभावयिषयास्ववाग्यन्त्रिता वादिनो न चलिष्यन्तीति तन्मताविष्करणायाहएके केचन ब्राह्मणविशेषास्तथा 'श्रमणाः ' परिव्राजकविशेषाः सर्वेऽप्येते ज्ञायतेऽनेनेति ज्ञानंहेयोपादेयार्थाऽऽविर्भावकं परस्परविरोधेन व्यवस्थितं स्वकमात्मीयं वदन्ति न च तानि ज्ञानानि परस्परविरोधेन प्रवृत्तत्वात्सत्यानि तस्मादज्ञानमेव श्रेयः किं ज्ञानपरिकल्पनयेति, एतदेव दर्शयति-सर्वस्मिन्नपि लोके ये प्राणाः प्राणिनो न ते किञ्चनापि सम्यगपेतवाचं (च्यं) जानन्तीति विदन्तीति ॥१४॥ - टीकार्थ शास्त्रकार अज्ञानवादियों के सिद्धान्त को दोषपूर्ण साबित करने के लिये उनके मन्तव्य की चर्चा करते हैं, जिसके द्वारा अज्ञानवादी अपने ही वचन में बद्ध होकर निरूत्तर होकर, इधर उधर नहीं जा सकते, अज्ञानवादियों का मन्तव्य है कि यहां कई ब्राह्मण विशेष - ब्राह्मण परम्परा से सम्बद्ध मतवादी और श्रमण परिव्राजक विशेष श्रमण परम्परा से सम्बद्ध साधु सन्यासी ये सभी हेय - त्यागने योग्य तथा उपादेय - ग्रहण करने योग्य सिद्धान्तों को प्रकट करने वाले अपने-अपने ज्ञान का प्रतिपादन करते हैं-निरुपण करते हैं। जिसके द्वारा पदार्थ जाना जाता है, उसे ज्ञान कहा जाता है । उनका यहां वर्णित श्रमण, ब्राह्मणों का ज्ञान परस्पर विरुद्ध 71
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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