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________________ । श्री सूत्रकृताङ्ग सूत्रम् , भवन्तीति, तथाहि-आर्हतानां किंचित्सुखदुःखादि नियतित एव भवति, तत्कारणस्य कर्मणः कस्मिंश्चिदवसरे अवश्यंभाव्युदयसद्भावान्नियतिकृतिकृतमित्युच्यते,तथा किंचिदनियतिकृतञ्च-पुरुषकारकालेश्वरस्वभावकर्मादिकृतं, तत्र कथञ्चित् सुखदु:खादेः पुरुषकारसाध्यत्वमप्याश्रीयते, यतः क्रियातः फलं भवति क्रिया च पुरुषकारायत्ता प्रवर्तते, तथा चोक्तम् - . "न दैवमिति सञ्चिन्त्य त्यजेदुद्यममात्मनः । अनुद्यमेन कस्तैलं तिलेभ्यः प्राप्तुमर्हति" ? ॥१॥ यत्तु समाने पुरुषव्यापारे फल वैचित्र्यं दुषणत्वेनोपन्यस्तं तददूषणमेव, यतस्तत्राऽपि पुरुषकार वैचित्र्यमपि फल वैचित्र्ये कारणं भवति, समाने वा पुरुष कारे यः फलाभावः कस्यचिद्भवति सोऽदृष्टकतः, तदपि चाऽस्माभिः कारणत्वेनाश्रितमेव तथा कालोऽपि कर्ता, यतो बकुलचम्पकाशोकपुन्नागनागसहकारादीनां विशिष्ट एव काले पुष्पफलाधुद्भवो न सर्वदेति, यच्चोक्तं-'कालस्यैकरूपत्वाजगद्वैचित्र्यं न घटत' इति, तदस्मान् प्रति न दूषणं यतोऽस्माभिर्न काल एवैकः कतृत्वेनाऽभ्युपगम्यतेऽपितु कर्माऽपि, ततो जगद्वैचित्र्यमित्यदोषः । तथेश्वरोऽपि कर्ता, आत्मैव हि तत्र तत्रोऽत्पत्तिद्वारेणसकलजगद्व्यापनादीश्वरः तस्य सुखदुखोत्पत्तिकर्तृत्वं सर्ववादिनामविगानेन सिद्धमेव । यच्चात्र मूर्त्तामूर्तादिकं दूषणमुपन्यस्तं तदेवंभूतेश्वर समाश्रयणे दूरोत्सादितमेवेति । स्वभावास्याऽपि कथंचित् कर्तृत्वमेव, तथाहि आत्मन उपयोग लक्षणत्वमसंख्येयप्रदेशत्वं पुद्गलानां च मूर्त्तत्वं धर्माधर्मास्तिकाययोर्गतिस्थित्युपष्टम्भकारित्वममूर्त्तत्वञ्चेत्येवमादि स्वभावापादितम् । यदपि चात्रात्म व्यतिरेकाव्यतिरेक रूपं दूषणमुपन्यस्तं तद्रूषणमेव, यतः स्वभाव आत्मनोऽव्यतिरिक्तः, आत्मनोऽपि च कर्तृत्वमभ्युपगतमेतदपि स्वभावापादित मेवेति । तथा कर्माऽपि कर्तृ भवत्येव, तद्धि जीव प्रदेशैः सहाऽन्योऽन्यानुवेधरूपतया व्यवस्थितं कथञ्चिच्चात्मनोऽभिन्नं,तद्वशाच्चात्मा नारकतिर्यङ्मनुष्यामरभवेषु पर्यटन्सुखदुःखादिकमनुभवतीति ।तदेवं नियत्यनियत्योः कर्तृत्वे युक्त्युपपन्ने सति नियतेरेव कर्तृत्वमभ्युपगच्छन्तो निर्बुद्धिकाः भवन्तीत्यवसेयम् ॥४॥ टीकार्थ - शास्त्रकार पूर्वोक्त दो श्लोकों द्वारा नियतिवादियों का मत उपन्यस्तकर-उपस्थापित कर अब उसका समाधान देते हैं - प्रस्तुत गाथा में नियतिवादी के पूर्वोक्त कथन को उपस्थित करने हेतु 'एवं' शब्द का प्रयोग हुआ है, नियतिवादी-नियतिवाद सम्बन्धी सिद्धान्तों की प्ररूपणा करने वालों को सत्-अस्तित्व जो पदार्थ है, असत्नास्तित्व-जो पदार्थ नहीं है, इस सम्बन्ध में यथार्थ विवेक नहीं है, वे ज्ञानशून्य है, वे बालक की तरह ज्ञानशून्य हैं, ऐसा होने के बावजूद वे अपने को पंड़ित-ज्ञानी-मानते हैं । नियतिवादियों को अज्ञानी-ज्ञान शून्य और पंडितमानीपांडित्य का अभिमान करने वाले क्यों कहा जाता है ? सूत्रकार इस संभावित प्रश्न या जिज्ञासा का समाधान देने हेतु वे निययानिययं-नियतानियतं का उल्लेख करते हुए बतलाते हैं कि कई सुख-अनुकूल साता मूलक स्थितिया ऐसी हैं जो नियत-निश्चित रूप में होती है क्योंकि वैसा कार्मिक उदय होता है तथा कई अनियत अर्थात् अपने उद्यम अथवा किसी अदृष्ट शक्ति के द्वारा किये जाने से अनियत-अनिश्चित, आकस्मिक होती हैं ऐसा होते हुए भी नियतिवादी सभी सुखो-अनुकूल सातामूलक स्थितियों तथा दुःखों-असातामूलक स्थितियों को एकान्त रूप से-निश्चित रूप से नियतिकृत बतलाते हैं । इस प्रकार वे नियतिवादी सुख एवं दुःख के पर्याय कारण को नहीं जानते, वे बुद्धि रहित हैं । आर्हतों का-तीर्थंकरों एवं सर्वज्ञों का यह अभिमत है कि कई सुख और दुःख ऐसे हैं जो नियति से ही होते हैं-जो नियत है क्योंकि उन सुख दुःखों के कारण जो कर्म हैं, उनका किसी विशेष अवसर पर-समय पर आवश्यक रूप में उदय होता है । यों वे हैं तो कर्मों के उदय से निष्पन्न परन्तु किसी विशेष रूप में, विशेष अवसर पर नियत दशा में उदय होने के कारण उन्हें नियति के अन्तर्गत -62)
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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