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________________ स्वसमय वक्तव्यताधिकारः टीकार्थ प्रथम उद्देशक में जो कहा जा चुका है उससे आगे का दूसरे उद्देशक में बताया जा रहा । यह प्रथम उद्देशक के साथ संबद्ध है - जुड़ा हुआ है। प्रथम उद्देशक में स्वसमय - अपने सिद्धान्त - जैन दर्शन के सिद्धान्त तथा पर समय- अन्य मतवादियों के सिद्धान्त की प्ररुपणा की गई है । वहीं दूसरे उद्देशक में भी आगे की जाती है अथवा प्रथम उद्देशक का अर्थाधिकार- स्वसमय और परसमय का विवेचन इस दूसरे उद्देशक से सम्बद्ध है । अथवा प्रथम उद्देशक में पंचभूतवादी आदि अन्य सैद्धान्तिकों के मत उपस्थित कर उनका निराकरण या खण्डन किया गया है। अब इस अध्ययन में उनसे अवशिष्ट - बचे हुए नियतिवादी आदि असम्यग्दृष्टि मतवादियों के मत उपस्थित कर उनका निराकरण किया जाएगा अथवा पहले उद्देशक में जो प्रतिपादित किया गया है कि मानव को चाहिये कि वह बंधन का स्वरूप जाने और फिर उसे तोड़े मिटाये नष्ट करे, किन्तु नियतिवादी प्रभृति अन्य सैद्धान्तिकों के मतानुसार बन्धन होता ही नहीं है । इस उद्देशक में इसका दिग्दर्शन कराया जायगा। इस प्रकार अनेक सम्बन्धों से जुड़े इस उद्देशक के चार अनुयोग द्वारों का वर्णन करने के अनन्तर बताया जाता है कि सूत्राङ्गम में अस्खलना रहित उच्चारण आदि के गुणों के साथ सूत्र का उच्चारण करना अपेक्षित है । प्रस्तुत सूत्र का अनन्तर-अव्यवहित- किसी अन्य सूत्र के व्यवधान से रहित, अत्यन्त निकटस्थ सूत्र तथा परम्पर-अन्य सूत्र द्वारा व्यवहित- अन्य सूत्र या सूत्रों के व्यवधान से युक्त सूत्र के साथ संबंध या वक्तव्य-कथन . करने योग्य है । अनन्तर सूत्र में यह प्रतिपादित हुआ है कि पंचमहाभूतवाद में आस्था रखने वाले, उनका निरूपण करने वाले तथा पंचस्कन्धवाद की मान्यता में विश्वास रखने वाले वादी जनों की बुद्धि मिथ्यात्व द्वारा विनष्ट हो गई है । यही कारण है कि वे असद्ग्रह - मिथ्यापदार्थों में आग्रह लिये हुए हैं । परमार्थ बोध-वस्तु तत्त्व के सही ज्ञान से विकल-रहित हैं । वे व्याधि-रुग्णावस्था, मृत्यु-मरण तथा जरा- वृद्धत्व से आकुल- पीड़ित होते हुए संसार चक्र में उत्तम, अधम योनियों में जाते हैं, भ्रमण करते हैं, अनन्तोबार एक गर्भ से निकलकर दूसरे गर्भ में जाते रहते हैं । जन्मते मरते रहते हैं। वही बात यहां है । नियतिवादी तथा अज्ञानवादी आदि जो चतुर्विध कर्म को बन्धनप्रद नहीं मानते। वे भी अन्य दर्शनवादियों की ज्यों संसार चक्र में भटकते हैं। एक गर्भ से दूसरे गर्भ में जाते हैं । 'बुज्झिज्जा' आदि यहां परम्पर सूत्र है । उसके साथ इसका सम्बन्ध इस प्रकार है 'बुज्झिज्जा' आदि सूत्र में प्ररूपित हुआ है कि जीव को बोध प्राप्त करना चाहिये । यहां भी यह जुड़ता है। नियतिवादियों के द्वारा भी यह प्रतिपादित हुआ है कि बोध या ज्ञान प्राप्त करना चाहिये । इसी प्रकार बीच में सूत्रों के साथ भी इसका संबंध जैसा जहाँ संगत हो- संभव हो जोड़ना चाहिये । इस प्रकार पहले के और आगे के सूत्रों के साथ सम्बन्ध रखने वाले इस सूत्र का तात्पर्य विस्तृत रूप में यहाँ व्याख्यात किया जाता है। यहां आया हुआ पुनः शब्द पूर्व सैद्धान्तिकों की तुलना में नियतिवादी की विशेषता प्रकट करता है । - व्याकरण के अनुसार जिनके कर्म की अविवक्षा की जाती है - जिनका कर्म विवक्षित वक्तुं इच्छितकहे जाने योग्य नहीं होता, वे धातु अकर्मक हो जाते हैं । इसलिये यहां जो 'आख्यात' शब्द आया है उसमेंभाव में निष्ठा प्रत्यय का प्रयोग हुआ है। वैसा होने पर उसके योग में 'एगेतिं' पद में कर्तृषष्ठी - कर्त्ता में षष्ठी विभक्ति आई है । इस तरह इसका आशय यह होता है कि इन नियतिवादी सैद्धान्तिकों ने ऐसा कहा है अर्थात् उनके कहने का अभिप्राय यह है । युक्ति द्वारा तर्क एवं न्याय द्वारा - जीवों के अस्तित्व की सिद्धि होती है । इस प्रतिवादन - कथन द्वारा पंचभूतवादी, तज्जीव तच्छरीरवादी सिद्धान्तिकों का मत अपाकृत-निराकृत या खंडित हो जाता है । जिस युक्ति द्वारा पूर्वोक्त सिद्धान्त निराकृत- खंडित होते हैं, उस युक्ति का पहले निरूपण हुआ है । आगे चलकर उसका 57
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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