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________________ स्वसमय वक्तव्यताधिकारः टीकार्थ- अब आगमकार पंचभूतात्मवाद,आत्माद्वैतवाद,तच्जीवतच्शरीरवाद,अकारकवाद,आत्मषष्ठवाद, क्षणिक पंचस्कन्धवाद-इन सबको निष्फल-मोक्ष प्राप्ति की दृष्टि से अफलप्रद प्रतिपादित करने हेतु-उनका जो अपना अपना मन्तव्य है, पहले उसे प्रकट करते हुए कहते हैं - अगार का अर्थ घर है, वहां जो निवास करते हैं, वे अगारी या गृहस्थ हैं । जो वन में रहते हैं, वे वानप्रस्थ या तापस हैं तथा जो प्रव्रज्या-उपसम्पदा या दीक्षा स्वीकार किये हुए हैं, उन शाक्य आदि श्रमणों के यहाँ आशय है, वे सब ऐसा विश्वास करते हैं कि जो पुरुष हमारे दर्शन को-हमारे सिद्धान्तों को स्वीकार कर लेते हैं, वे समग्र दुःखों से विमुक्त हो जाते हैं । 'अपि' शब्द यहां संभावना के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। आर्ष प्रयोग होने से बहुवचन के स्थान पर सूत्र में एकवचन आया है। पंचभूतवादी तथा तज्जीवतच्छरीरवादी . जनों का ऐसा आशय-अभिप्राय या मन्तव्य है कि जो लोग हमारे दर्शन को अंगीकार करते हैं वे गृहस्थ में रहते हुए सन्यासी के रूप में मस्तक मुंडाना दण्ड और मृगछाला धारण करना, जटाजूट रखना, गेरुएं वस्त्र धारण करना, केश लुंचन करना, नग्न-निर्वस्त्र रहना, तपश्चरण करना इत्यादि दु:खमय-दैहिक क्लेशों से बच जाते हैं । उनका कहना है कि तपस्याएं तो तरह-तरह की यातनाएं-कष्ट हैं । संयम स्वीकार करना सांसारिक भोगों से वंचित रहना है तथा आग्निहोत्र आदि कृत्य बालकों की क्रीड़ा के समान निरर्थक है । मोक्षवादी-मोक्ष को स्वीकार करने वाले, सांख्य दर्शन में आस्था रखने वाले जन इस प्रकार संभावित मानते हैं कि अकर्तृत्ववाद-अद्वैतवाद, पंचस्कन्धात्मवाद आदि का प्रतिपादन करने वाले हमारे दर्शन या सिद्धान्तों को स्वीकार कर जो लोग प्रव्रज्रित होते हैं-दीक्षित होते हैं या संन्यास स्वीकार करते हैं वे जन्म, वृद्धावस्था, मृत्यु, बार बार गर्भ में जाने की परम्परा-संसार में आवागमन और अनेक प्रकार के अत्यन्त तीव्र दैहिक और मानसिक कष्टों से छूट जाते हैं । सब प्रकार के द्वन्द्वों से-संकटों से रहित होकर वे मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं। ते णावि संधिं णच्चा णं, न ते धम्मविओ जणा । जे ते उ वाइणो एवं, न ते ओहंतराऽऽहिया ॥२०॥ छाया - ते नाऽपि सन्धिं ज्ञात्वा, न ते धर्मविदो जनाः । ये ते तु वादिन एवं न ते ओघन्तरा आख्याताः ॥ ____ अनुवाद - जिनकी पहले चर्चा आई है, वे अन्य दर्शनों में विश्वास करने वाले संधि को नहीं जानते, वे धर्म का तत्व नहीं जानते । वे इस संसार सागर को पार नहीं कर सकते-ऐसा कहा गया है । टीका - इदानीं तेषामेवाफलवादित्वाविष्करणायाह - ते-पंचभूतवाद्यायाः नाऽपि नैव सन्धिं छिद्रं विवरं, स च द्रव्यभावभेदाद् द्वेधा, तत्र द्रव्यसन्धिः कुड्यादेः, भावसन्धिश्च ज्ञानावरणादिरूपकर्मविवर रूपः। तमज्ञात्वा ते प्रवृत्ताःणमिति वाक्यालंकारे, यथाऽऽत्मकर्मणोः सन्धि द्विधाभावलक्षणों भवति तथा अबुद्ध्वैव ते वराकादुःखमोक्षार्थमभ्युद्यता इत्यर्थः । यथा त एवंभूतास्तथा प्रतिपादितंलेशतः प्रतिपादयिष्यते च । यदिवा सन्धानं सन्धिं-उत्तरोत्तर पदार्थ-परिज्ञानं, तदज्ञात्वा प्रवृत्ता इति । यतश्चैवमतस्ते न सम्यग् धर्मपरिच्छेदे कर्तव्ये विद्वांसो-निपुणाः 'जना:' पंचभूतास्तित्वादिवादिनो लोका इति । तथाहि-क्षान्त्यादिको दशविधो धर्मस्तमज्ञात्वैवाऽन्यथाऽन्यथा च धर्मं प्रतिपादयन्ति, यत्फलाभावाच्च तेषामफलवादित्वं तदुत्तरग्रंथेनोद्देशक - 51
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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