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________________ श्री सूत्रकृताङ्ग सूत्रम् प्रस्तुत टीकानुवाद की पांडुलिपि तैयार करने में सुहृदवर श्रीमान् अमोलकचन्द जी सा. हींगड़, अजमेर एवं श्रीमान् महेन्द्रकुमार जी सा. खाबिया, पीसांगन वालों ने समर्पित भाव से परिश्रम किया है। श्रीमान् अमोलकचंद जी सा. ने तो इसका प्रूफ-संशोधन भी किया है । आपके स्नेहपूर्ण सहयोग के लिए हार्दिक आभार प्रकट करते हैं । आचार्यप्रवर के अजमेर चातुर्मास में ही यह अनुवाद तैयार हो चुका था एवं आचार्य-पद-चादरसमर्पण समारोह के अवसर पर दिनाङ्क २४ जनवरी, ९९ को इसे लोकार्पित करने का निश्चय किया जा चुका था । इस अल्प अवधि में इसका मुद्रण कार्य संपन्न कर इसे सव-जन के लिए उपलब्ध कराने में निओ ब्लॉक एण्ड प्रिण्ट्स के अध्यक्ष श्री जितेन्द्र जी पाटनी 'पिन्टू जी' ने अथक परिश्रम किया है अतः उनके प्रति भी हार्दिक आभार प्रकट करते हैं । । चातुर्मास काल में पाण्डुलिपि को पुनः पुनः पढ़कर ग्रन्थ की शोभावृद्धि के लिए एवं पाठकों के लिए उपयोगी बनाने की दृष्टि से श्रीमान् विनयकुमार जी बरमेचा, निहालचंद जी सा. चौधरी, रूपचन्द जी सा. बोहरा प्रभृति युवा साथियों ने अपने अमूल्य सुझाव दिए है जिससे इसकी उपादेयता व बहिर्सज्जा अधिक बढ़ गई है अतः उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करना मैं अपना कर्त्तव्य मानता हूँ । श्री अ. भा. प्राज्ञ जैन युवा मण्डल के अध्यक्ष श्रीमान् प्रकाशचंद जी सा. जामड़ एवं मंत्री श्रीमान् ज्ञानचंद जी सा. बाफणा व उनके युवा साथियों ने समय-समय पर हमें उत्साहित कर व आवश्यक सहयोग प्रदान कर इसका प्रकाशन संभव बनाया है अतः वे भी धन्यवादाह हैं । ___माननीय विद्वद्वरेण्य डॉ. छगनलाल जी सा. शास्त्री का आभार किन शब्दों में व्यक्त करूँ । आप हमारे आत्मीय हैं, इस वृहत् परिवार के एक सृजनशील-चिन्तक के रूप में हमारे मार्गदर्शक हैं । उनकी बहुज्ञता, इस अनुवाद कार्य की संपन्नता में सदैव प्रेरक रही है । स्वास्थ्य की पूर्ण अनुकूलता नहीं होते हुए भी आपका जो पथ-प्रदर्शन मिला उसके प्रति शतशः नमनपूर्वक हार्दिक श्रद्धाभिव्यक्ति करते हुए आभार प्रकट करता हूँ । __ हमारे, अपने आत्मीय, परम गुरुभक्त, श्रद्धा एवं सेवा की साकार प्रतिमा श्रीमान् नितिनकुमारजी कावड़िया (सादड़ी वाले) दिल्ली, श्रीमान् इन्दरचंद जी सा. हरकावत जयपुर, श्रीमान् बुधराज जी सा. लूणावत, बिजयनगर, श्रीमान् जबरचंद जी सा. चोरडिया, मेड़तासिटी, श्रीमान् रोशनलाल जी सा. खटोड़ सरेरी एवं श्रीमान् ज्ञानचंद जी सा. सिंघवी बिजयनगर वालों का भी हृदय से आभार मानता हूँ जिन्होंने अपने द्रव्य का सद्व्ययकर प्रस्तुत टीकानुवाद को प्रकाश में लाकर अपूर्व श्रुतभक्ति का परिचय दिया है । उनकी जिनवाणी-अनुरक्तता एवं आस्था हमारे लिए अनुकरणीय हैं । उनकी सेवा, स्वाध्याय एवं वात्सल्यभाव के प्रति नमन ! प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से जिन्होंने भी इसके प्रकाशन में अपनी शुभकामनाएं समर्पितकर हमारा उत्साहवर्द्धन किया, उन सभी के प्रति अनेकानेक साधुवादपूर्वक कृतज्ञता-ज्ञापन । इत्यलम् । नेमीचन्द खाबिया मंत्री गुलाबपुरा श्री श्वे. स्था. जैन स्वाध्यायी संघ, दि. २४.१.९९ गुलाबपुरा vii
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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