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________________ ग्रन्थनामकं अध्ययनं है, उसे किसी अपरिणीत- अपरिपक्व पुरुष को न कहे क्योंकि वैसे पुरुष के आगे सिद्धान्त का रहस्य प्रकट करने से वह दूषित-विकृत हो जाता है । इसलिये कहा गया है कि जिसकी बुद्धि अप्रशान्त है - विशेष रूप से शांत नहीं है, उसको शास्त्र का सद्भाव- श्रेष्ठ सिद्धान्त बतलाना दोष हेतु होता है। जैसे जिसको नया बुखार है-अभी बुखार चढ़ा है उसे बुखार को रोकने की औषधि देना दोषजनक है इत्यादि । स्वपरत्रायी-अपना तथा अन्य का त्राण करने वाला अथवा प्राणियों का रक्षण करने वाला साधु मनमानी कल्पना द्वारा सूत्र एवं उसके अर्थ को अन्यथा न करे - विपरीत न बनावे । वह सूत्र को अन्यथा क्यों नहीं करे ? इसका स्पष्टीकरण करते · हुए सूत्रकार कहते हैं परहित - लोगों के हित में रत, संलग्न शास्ता - उपदेष्टा साधु, आचार्य में जो अपनी भक्ति है, जो बहुमान है उसका अनुचिन्तन करता हुआ सोचे कि मेरे इस कथन से आगम में कोई बाधा तो उपस्थित नहीं होती है । तत् पश्चात् वह अपना वक्तव्य कहे । आचार्य आदि से जो सुना हो तदनुसार वह सम्यक्त्व की आराधना का अनुवर्तन करता हुआ गुरु के ऋण से मुक्त होने हेतु वैसी ही प्ररूपणा करे । अपनी सुखशीलतासुविधा नहीं सोचता हुआ जिस किसी प्रकार से न कहे। जैसा मन में आवे वैसा न बोले । से सुद्धसुत्ते अवहाणवं च, धम्मं च जे विंदति तत्थ तत्थ । आदेज्जवक्के कुसले वियत्ते, स अरिहइ भासिउं तं समाहिं ॥२७॥ तिबेमि ॥ छाया - स शुद्धसूत्र उपधानवांश्च धर्मञ्च यो विन्दति तत्र तत्र । , आदेयवाक्यः कुशलो व्यक्तः सोऽर्हति भाषितुं तं समाधिम् ॥ इति ब्रवीमि ॥ अनुवाद - जो साधु सूत्र का शुद्ध उच्चारण करता है, जो शास्त्र विहीत तपश्चरण करता है, जो उत्सर्ग के स्थान पर उत्सर्ग मूलक धर्म को तथा अपवाद के स्थान पर अपवादमूलक धर्म को अपनाता है वही आदेय वाक्य है । उसी का वचन ग्राह्य है - इस प्रकार शास्त्र के अर्थ में कुशल तथा व्यक्त-विचारपूर्वक कार्यशील साधुसर्वज्ञ प्रणीत भाव समाधि का अभिभाषण प्रतिपादन कर सकता है । टीका – अध्ययनोपसंहारार्थमाह-'स' सम्यग्दर्शनस्यालूषको यथावस्थितागमस्य प्रणेताऽनुविचिन्त्यभाषकः शुद्धम्-अवदातं यथावस्थितवस्तुप्ररूपणोऽध्ययनतश्च सूत्रप्रवचनं यस्यासौ शुद्धसूत्र:, तथोपधानं तपश्चरणं यद्यस्य सूत्रस्याभिहितमागमेतद्विद्यते मस्यासावुपधानवान्, तथा 'धर्मं ' श्रुतचारित्राख्यं यः सम्यक् वेत्ति विन्दते वा सम्यग् लभते 'तत्र तत्रे' ति य आज्ञाग्राह्योऽर्थः स आज्ञयैव प्रतिपत्तव्यो हेतुकस्तु सम्यग्घेतुना यदिवा स्वसमयसिद्धोऽर्थः स्वसमय व्यवस्थापनीयः पर (समय) सिद्धश्च परस्मिन् अथवोत्सर्गापवादयोर्व्यवस्थितोऽर्थस्ताभ्यामेव यथास्वं प्रतिपादयितव्यः, एतद्गुणसंपन्नश्च 'आदेयवाक्यो' ग्राह्यवाक्यो भवति, तथा 'कुशलो' निपुणः आगमप्रतिपादने सदनुष्ठाने च 'व्यक्तः' परिस्फुटो नासमीक्ष्यकारी, यश्चैतद्गुणसमन्वितः सोऽर्हति - योग्यो भवति 'तं' सर्वज्ञोक्तं ज्ञानादिकं वा भावसमाधिं 'भाषितुं' प्रतिपादयितुं, नापरः कश्चिदिति । इति परिसमाप्त्यर्थे, ब्रवीमीति पूर्ववत्, गतोऽनुगमा, नयाः प्राग्वद्वयाख्येयाः ||२७|| ॥ समाप्तं चतुर्दशं ग्रन्थाख्यमध्ययनमिति ॥ टीकार्थ - सूत्रकार इस अध्ययन का उपसंहार करते हुए कहते हैं - जो साधु सम्यक्दर्शन को दोषयुक्तविकृत नहीं करता, आगम के यथावस्थित अर्थ का प्रणयन करता है - प्रकटन करता है, अनुचिन्तनपूर्वक भाषण 593
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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