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________________ श्री सूत्रकृताङ्ग सूत्रम् श्रुतचारित्राख्यं 'व्यागृणन्ति' प्रतिपादयन्ति यदिवा स्वपरशक्तिं परिज्ञाय पर्षदं वा प्रतिपाद्यं चार्थं सम्यगवबुध्य धर्मं प्रतिपादयन्ति । ते चैवंविधा बुद्धा: - कालत्रयवेदिनो जन्मान्तरसंचितानां कर्मणामन्तकरा भवन्ति अन्येषां च 'कर्मापनयनसमर्था भवन्तीति दर्शयति - ते यथावस्थितधर्मप्ररूपका 'द्वयोरपि' परात्मनोः कर्मपाशविमोचनया स्नेहादिनिगडविमोचनया वा करणभूतया संसारसमुद्रस्य पारगा भवन्ति । ते चैवंभूताः ? 'सम्यक् शोधितं ' पूर्वोत्तर विरुद्धं ' प्रश्नं' शब्दमुदाहरन्ति, तथाहि पूर्वं बुद्ध्या पर्यालोच्य कोऽयं पुरुषः कस्य चार्थस्य ग्रहणसमर्थोऽहं वाकिंभूतार्थप्रतिपादनशक्त इत्येवं सम्यक् परीक्ष्य व्याकुर्यादिति, अथवा परेण कञ्चिदर्थं पृष्टस्तं प्रश्नं सम्यग् परीक्ष्योदाहरेत्-सम्युगत्तरं दद्यादिति, तथा चोक्तम् " आयरियसयासा व धारिएण अत्थेण झरियमुणिएणं । तो संघमज्झयारे ववहरिडं जे सुहं होंति ॥ १॥" छाया - आचार्यसकाशाद् अवधारितेनार्थेन स्मारकेण ज्ञात्रा च ततः संघमध्ये व्यवहर्तुं सुखं भवति ॥ १ ॥ तदेवं ते गीतार्था यथावस्थितं धर्मं कथयन्तः स्वपरतारका भवन्तीति ॥ १८ ॥ टीकार्थ इस प्रकार गुरुकुल में निवास करने के कारण धर्म में सुस्थित सुदृढ़, बहुश्रुत - प्रतिभावान, बुद्धिशाली एवं अर्थ विशारद और पदार्थ ज्ञान में कुशल या निष्णात होकर जैसा करते हैं जो कार्य करते हैं उसका दिक्दर्शन कराने हेतु सूत्रकार प्रतिपादित करते है कि जिसके द्वारा पदार्थ परिज्ञात होता है उसे संख्या कहा जाता है । वह सद्बुद्धि है । साधु सद्बुद्धि द्वारा श्रुत चारित्र मूलक धर्म के वास्तविक स्वरूप को परिज्ञात कर-भली भांति जानकर प्रतिपादित करता है अथवा सद्बुद्धि द्वारा वह साधु अपनी और औरों की योग्यता जानकर अथवा धर्म सभा की योग्यता जानता हुआ परिषद् को प्रतिपाद्य अर्थ या विषय को भली भांति समझ कर धर्म का प्रतिपादन करते हैं। इस प्रकार वे बुद्ध- त्रिकालवेत्ता पुरुष पूर्व जन्म के संचित कर्मों का विनाश करते हैं और दूसरों के कर्मों का अपनयन करने में सक्षम होते हैं । सूत्रकार इसका दिग्दर्शन कराते हुए कहते हैं - धर्म के सत्य स्वरूप के प्ररूपक - व्याख्याता वे महापुरुष अपने तथा औरों के कर्मपाश को विमोचित कर अथवा स्नेह रूपी निगड- सांकल या बेड़ी से छूटकर - औरों को छुड़ाकर संसार सागर को पार कर जाते हैं। वे महापुरुष भली भांति शोधित कर - परिष्कृत कर पूर्वोत्तर - पहले और पीछे से अविरुद्ध-अप्रतिकूल शब्दों को बोलते हैं । वे पहले ही अपनी बुद्धि द्वारा यह पर्यालोचित कर कि यह पुरुष कौन है किस अर्थ पदार्थ को ग्रहण करने में सक्षम हो सकता है तथा मैं किस प्रकार के अर्थ को प्रतिपादित करने में सशक्त हूँ । इनको सम्यक् परीक्षित कर वे व्याख्या - विवेचन करते हैं अथवा कोई पुरुष यदि साधु से किसी विषय में पूछे तो साधु उस प्रश्न का भली भांति परीक्षण कर, उसे समझकर फिर उसका उत्तर दे । कहा गया है- आचार्य के सकाश-पास जिसने अर्थ को धारण किया है, उनसे समझकर निश्चित किया है वह स्मृतिशाली पुरुष संघ या जन समूह के बीच में सुखपूर्वक सफलता के साथ पदार्थ की व्याख्या कर सकता है। इस प्रकार गीतार्थ-धर्म सिद्धान्तों के गम्भीरवेत्ता धर्म के सच्चे स्वरूप को बतलाते हुए अपने आपको तथा औरों को संसार सागर से पार करते हैं । 1 - छाया - ❀❀ णो छाय णविय लूसएज्जा, माणं ण सेवेज्ज पगासणं च । ण यावि पन्ने परिहास कुज्जा, ण याऽऽसियावाय वियागरेज्जा ॥ १९ ॥ - नो छादये न्नापिच लूसयेन्मानं न सेवेत प्रकाशनञ्च । न चाऽपि प्राज्ञः परिहासं कुर्य्यान्न चाप्याशीर्वादं व्यागृणीयात् ॥ 584
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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