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________________ श्री याताथ्याध्ययनं अनुवाद - साधु धर्मोपदेश द्वारा अपनी पूजा-प्रतिष्ठा तथा श्लोक - यश की कामना न करे । वह ऐसा कुछ न करे जो किसी को प्रिय-प्रीतिकर लगता हो और किसी को अप्रिय - अप्रीतिकर प्रतीत होता हो । वह समस्त अनर्थों का-दुष्कार्यों का वर्जन करता हुआ अनाकुल- कषाय शून्य होकर धर्म का उपदेश करे । टीका - पूजासत्कारादिनिरपेक्षण च सर्वमेव तपश्चरणादिकं विधेयं विशेषतो धर्मदेशनेत्येतदभिप्रायवानाहसाधुर्देशनां विदधानो न पूजनं - वस्त्र - पात्रादिला भरूपमभिकाङ्क्षेन्नापि श्लोकं - श्लाघां कीर्तिम् आत्मप्रशंसा‘कामयेद्' अभिलषेत् तथा श्रोतुर्यत्प्रियं राजकथाविकथादिकं छलितकथादिकं च तथाऽप्रियं च तत्समाश्रितदेवता विशेष निन्दादिकं न कथयेद्, अरक्तद्विष्टतया श्रोतुरभिप्रायमभिसमीक्ष्य यथावस्थितं धर्मं सम्यग्दर्शनादिकं कथयेत्,उपसंहारमाह‘सर्वाननर्थान्’ पूजासत्कारलाभाभिप्रायेण स्वकृतान् परदूषणतया च परकृतान् 'वर्जयन्' परिहरन् कथयेद् 'अनाकुल: ' सूत्रार्थादनुत्तरन् अकषायी भिक्षुर्भवेदिति ॥२२॥ टीकार्थ - साधु पूजा-प्रतिष्ठा, सत्कार-सम्मान आदि से निरपेक्ष-निराकांक्ष होकर तपश्चरणादि धार्मिक कृत्य करे । धर्मदेशना तो विशेषतः ऐसी स्थिति में होता हुआ करे, इस अभिप्राय - आशय को उद्दिष्ट कर सूत्रकार कहते हैं-धर्म देशना करता हुआ - उपदेश देता हुआ साधु वस्त्र तथा पात्र आदि के लाभ के रूप में सत्कार सम्मान की कामना न करे और न वह अपनी प्रशस्ति की अभिलाषा रखे। श्रोता को जो प्रिय-प्रीतिप्रद लगे, ऐसी राजकथा, विकथा तथा छलित कथा आदि तथा श्रोता के लिये अपने अप्रीतिप्रद उस द्वारा समाश्रित अभि देवत्व की निन्दा आदि न करे । वह अरक्त अदृष्ट-राग द्वेष रहित होकर श्रवण करने के भाव का अभिसमिक्षण कर-भली भांति समझ कर यथावस्थित धर्म-सत्य धर्म जो सम्यक्दर्शन आदि रूप है का कथन - प्रतिपादन करे । उपसंहार करते हुए-सार संक्षेप बतलाते हुए कहते हैं साधु सभी अनर्थों का - पूजा, सत्कार तथा लाभ पाने हेतु अपने द्वारा किये गये परदूषणता - औरों पर दोषारोपण करने के कारण दूसरों द्वारा किये गये अनर्थों का वर्जनपरिहार करते हुए वह उपदेश करे । धर्म देशना दे अनाकुल- आकुलता रहित आत्मस्थिर होता हुआ, सूत्र के अर्थ से नहीं हटता हुआ कषाय रहित होकर भाषण करे । आहत्तहीयं समुपेहमाणे सव्वेहिं पाणेहिं णिहाय दंडं । णो जीवियं णो मरणाहिकंखी, परिव्वज्जा वलयाविमुक्के (मेहावी वलयविप्पमुक्के) ॥ २३ ॥ तिबेमि ॥ छाया याथातथ्यं समुत्प्रेक्षमाणः सर्वेषु प्राणिषु निधाय दण्डम् । नो जीवितं नो मरणावकाङ्क्षी, परिव्रजेद् बलयाद् विमुक्त । इति ब्रवीमि ॥ अनुवाद - साधु याथातथ्य - यथार्थ या सत्य धर्म को समुत्प्रेक्षित करता हुआ भली भांति देखता हुआस्वायत्त करता हुआ समस्त प्राणियों की हिंसा का परिवर्जन कर जीवन तथा मृत्यु से निरांकाक्ष होकर माया का परित्याग करे - विहरण करे । टीका संर्वाध्ययनोपसंहारार्थमाह--' आहात्तीय' मित्यादि, यथातथाभावो याथातथ्यं धर्ममार्गसमवसरणाख्याध्ययन त्रोयक्तार्थतत्त्वं सूत्रानुगतं सम्यक्त्वं चारित्रं वा ततव' प्रेक्षमाणाः' पर्यालोचयन् सूत्रार्थं सदनुष्ठानतोऽभ्यस्यन् ‘सर्वेषु' स्थावरजङ्गमेषु सूक्ष्मबादरभेदभिन्नेषु पृथिवी कायादिषु दण्डयन्ते प्राणिनो येन स दण्डः प्राणव्यपरोपणविधिस्तं 565
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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