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________________ श्री सूत्रकृताङ्ग सूत्रम् 'विनाशः' अभावः देहिन आत्मनोऽप्यभावो भवति यतः, न पुनः शरीरे विनष्टे तस्मादात्मा परलोकं गत्वा पुण्यं पापं वाडनुभवतीति । अतो धर्मिण आत्मनोऽभावातद्धर्मयोः पुण्यपापयोरप्यभाव इति । अस्मिश्चार्थे बहवो दृष्टान्ताः सन्ति, तद्यथा-यथा जल बुद्बुदो जलातिरेकेण नापर: कश्चिद्विद्यते तथा भूतव्यतिरेकेण नाऽपरः कश्चिदात्मेति । तथा यथा कदलीस्तम्भस्य बहिस्त्वगपनयने क्रियमाणे त्वङ्‌मात्रमेव सर्वं नान्तः कश्चित्सारोऽस्ति, एवं भूत समुदाये विघटति सति तावन्मात्रं विहाय नान्तः सारभूतः कश्चिदात्माख्यः पदार्थ उपलभ्यते, यथा वालातं भ्राम्यमाणमतद्रुपमपि चक्रबुद्धि मुत्पादयति, एवं भूत समुदायोऽपि विशिष्टक्रियोपेतो जीवभ्रान्तिमुत्पादयतीति । यथा च स्वप्ने बहिर्मुखाकारतया विज्ञानमनुभूयतेऽन्तरेणैव बाह्यमर्थम्, एवमात्मानमन्तरेण तद्विज्ञानं भूत समुदाये प्रादुर्भवतीति । तथा यथाऽऽदर्शे स्वच्छत्वात्प्रतिबिम्बितो बहिः स्थितोऽप्यर्थोऽन्तर्गतो लक्ष्यते, न चासौ तथा, यथा च ग्रीष्मे भौमेनोष्मणापरिस्पन्दमाना मरीचयो जलाकारं विज्ञानमुत्पादयन्ति एव मन्येऽपि गन्धर्वनगरादयः स्वस्वरूपेणा तथा भूता अपि तथा प्रतिभासन्ते, तथाऽऽत्माऽपि भूतसमुदायस्य कायाकारपरिणतौ सत्यां पृथगसन्नेव तथा भ्रान्तिं समुत्पादयतीति । अभीषाञ्च दृष्टान्तानां प्रतिपादकानि केचित्सूत्राणि व्याचक्षते, अस्माभिस्तु सूत्रदर्शेषु चिरन्तनटीकायां चादृष्टत्वान्नोल्लिङ्गितानीति । ननु च यदि भूतव्यतिरिक्तः कश्चिदात्मा न विद्यते, तत्कृते च पुण्यापुण्ये न स्तः तत्कथमेतज्जगद्वैचित्र्यं घटते ? तद्यथा कश्चिदीश्वरोऽपरो दरिद्रोऽन्यः सुभगोऽपरोदुर्भगः सुखी दुःखी सुरुपो मन्दरूपो व्याधितो नीरोगीति, एवं प्रकारा च विचित्रता किं निबन्धनेति ? अत्रोच्यते, स्वभावात्, "तथाहि - कुत्रचिच्छिलाशकले प्रतिमारूपं निष्पाद्यते तच्च कुंकुमागरुचन्दनादिविलोपनानुभोग मनुभवति धूपाद्यामोदञ्च, अन्यस्मिंस्तु पाषाणखंडे पादक्षालनादि क्रियते, न च तयोः पाषाणखण्डयोः शुभाशुभेऽस्तः यदुदयात्स तादृग्विधावस्थाविशेष इत्येवं स्वाभावाज्जगद्वैचित्र्यं, तथा चोक्तम् - "कण्टकस्य च तीक्ष्णत्वं, मयूरस्य विचित्रता । वर्णाश्च ताम्रचूडानां स्वभावेन भवन्ति हि " इति तज्जीव तच्छरीरवादिमतं गतम् ॥१२॥ टीकार्थ - तच्जीव तच्शरीरवादी के सिद्धान्तानुसार जो पहले बताया गया कि आत्मा जो धर्मी है उसके न रहने पर उसके धर्म का अस्तित्व नहीं रहता । सूत्रकार इसे उपस्थित कहते हैं - जो आत्मा जिससे अभ्यदय - उन्नति या अनुकूल सुख समृद्धि प्राप्त करती है उसे पुण्य कहा जाता है । पुण्य से उल्टा है अर्थात् जीव जिससे अभ्युदय नहीं पाता, प्रतिकूल - दुःखात्मक परिस्थितियां प्राप्त करता है, उसे पाप कहा जाता है । पुण्य और पाप दोनों का कोई अस्तित्व नहीं है क्योंकि धर्मीरूप आत्मा का ही कोई अस्तित्व नहीं है । तब यह तो धर्म है, इनका अस्तित्व कहाँ से हो । आत्मा का अस्तित्व न होने से इस लोक से पृथक् कोई अन्य लोक भी नहीं है, जहां मनुष्य पुण्य और पाप का फल भोग सके । सूत्रकार इस संबंध में कारण का उपादान करते हैं । शरीर रूप में विद्यमान भूतों का विघटन या विनाश होने से, उनके पृथक्-पृथक् हो जाने से आत्मा का भी अभाव हो जाता है, अस्तित्त्व नहीं रहता । अतः देह के विनष्ट हो जाने पर उससे पृथक् होकर आत्मा परलोक जाकर पुण्य व पाप के फल का अनुभव नहीं करती । अतः आत्मा जो धर्मी है, उसका अभाव हो जाने पर उनके पुण्य पाप रूपी धर्मी का भी अभाव हो जाता है यह तज्जीव तच्शरीर वादियों के मत की बात । इस संबंध में अनेक दृष्टान्त उपस्थित करते हैं। जैसे पानी का एक बुलबुला वस्तुतः पानी से कोई पृथक् पदार्थ नहीं है, उसी प्रकार आत्मा पांच भूतों से कोई अलग पदार्थ नहीं है । जैसे कदलि स्तंभ के तने से छिलके उतारते जाय तो छिलके उतरते जाते हैं। उनसे भिन्न कोई सार रूप पदार्थ उपलब्ध नहीं होता, यही बात भूत समवाय के साथ है ! भूतों के विघटित - विछिन्न- पृथक् पृथक् हो जाने पर भीतर कोई सारभूत आत्मा नाम 26 7
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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