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________________ श्री मार्गाध्ययनं टीकार्थ शब्द आदि इन्द्रिय विषय ग्रामधर्म कहलाते हैं। ऐसे कतिपय साधु हैं जो उनसे विरत, निवृत्त होते हैं । अर्थात् मनोज्ञ-मन के लिये प्रीतिप्रद शब्दादि विषयों में अनुराग तथा अमनोज्ञ - दुःखप्रद विषयों में द्वेष नहीं करते । संसार के उदर में भीतर रहने वाले जो प्राणी हैं, वे सभी जीवितार्थी हैं- जीने की कामना लिये रहते हैं । वे दु:ख से द्वेष करते हैं - दुःख नहीं चाहते । अतः उन प्राणियों को आत्मोपम समझकर साधु उनको दुःख न देता हुआ उनके त्राण हेतु सामर्थ्य-पराक्रम प्रकट करता हुआ संयम का अनुष्ठान करे । ॐ ॐ ॐ - अइमाणं च मायं च, तं परिन्नाय सव्वमेयं णिराकिच्चा, णिव्वाणं संधए छाया - - अनुवाद पंडित - ज्ञानयुक्त साधु अभिमान तथा माया या प्रवञ्चना का स्वरूप समझकर तथा उनका परित्याग कर मोक्ष की साधना में तत्पर रहे । - पंडिए । मुणी ||३४|| अतिमानञ्च मायाश्च तत्परिज्ञाय पण्डितः । सर्वमेतन्निराकृत्य, निर्वाणं संधयेन्मुनिः ॥ टीका - संयम विघ्नकारिणामपनयनार्थमाह-अतीव मानोऽतिमानश्चारित्रमतिक्रम्य यो वर्तते चकारादेतद्देश्य: क्रोधोऽपि परिगृह्यते, एवमतिमायां चशब्दादतिलोभं च, तमेवंभूतं कषायव्रातं संयमपरिपन्थिनं 'पण्डितो' विवेकी परिज्ञाय सर्वमेनं संसारकारणभूतं कषायसमूहं निराकृत्य निर्वाणमनुसंधयेत्, सति च कषायकदम्बके न सम्यक् संयमः सफलतां प्रतिपद्यते, तदुक्तम् "सामण्णमणुचरंतस्स, कसाया जस्स उक्कडा होंति । मण्णामि उच्छुपुप्फं व, निष्फलं तस्स सामण्णं ॥१॥" छाया - श्रामण्यमनुचरतः कषाया यस्योत्कटा भवंति । मन्ये इक्षुपुष्पमिव निष्फलं तस्य श्रामण्यं ॥१॥ तन्निष्फलत्वे च न मोक्ष संभव:, तथा चोक्तम् "संसारादपलायन प्रति भुवो रागादयो में स्थितास्तृष्णा बन्धनबध्यमानमखिलं किं वेत्सि नेदं जगत् ? । मृत्यो ! मुञ्ज जराकरेण परुषं केशेषु मा मा ग्रहीरेही त्यादर मन्तरेण भवतः किं नागमिष्याम्यहम् ? ॥१॥" इत्यादि । तदेवमेवंभूतकषाय परित्यागादच्छिन्न प्रशस्त भावानुसंधनया निर्वाणानुसंधानमेव श्रेय इति ||३४|| टीकार्थ संयम में विघ्न उपस्थित करने वाले दोषों का अपनयन करने हेतु सूत्रकार कहते हैं - जो मान या अहंकार चारित्र को अतिक्रान्त करता है ध्वस्त करता है, उसे अतिमान कहा जाता है। यहां प्रयुक्त 'च' शब्द से इसी प्रकार क्रोध का भी ग्रहण है । अतिमाया और 'च' शब्द से अतिलोभ गृहीत है । यह कषाय संयम के परिपन्थी - विरोधी, शत्रु हैं। अतः पंडित - विवेकी मुनि संसार के कारणभूत इन कषायों का निराकरण कर इनका त्याग कर निर्वाण का अनुसंधान करे। मोक्ष के मार्ग पर गमनोद्यत रहे । कषायों के रहते हुए संयम का भलीभांति - सफलतापूर्वक पालन नहीं किया जा सकता है । अतएव कहा है श्रामण्यश्रमण जीवन का, संयम का अनुचरण-अनुपालन करते हुए जिस पुरुष के कषाय उत्कट - प्रबल बने रहते हैं, उसका श्रामण्य इक्षु के पुष्प की ज्यों निरर्थक है । श्रामण्य के निष्फल होने पर मोक्ष प्राप्त होना संभव नहीं है । अतएव कहा है-है मृत्यु ! संसार से पलायन कर अन्यत्र न जाने देने वाले राग आदि मुझमें विद्यमान हैं। 489 -
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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