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________________ धर्म अध्ययनं टीकार्थ - साधु को देने हेतु जो आहार भोजन आदि व्यवस्थापित किया जाता है- रखा जाता है, उसे उद्देशिक कहते हैं । जो आहार साधु के लिए क्रय किया जाता खरीदा जाता है उसे क्रीत कहा जाता है। साधु को देने हेतु जो आहार अन्य किसी से उधार लिया जाता है उसे पामित्य कहा जाता है । यहाँ चकार समुच्चय के अर्थ में है । तथा एवकार अवधारणा के अर्थ में है । साधु को देने हेतु गृहस्थ जो आहार लाता है, वह अहत्त कहा जाता है। आधाकर्मी सदोष आहार के एक कण से भी सप्रंत्त होने पर शुद्ध आहार अशुद्ध हो जाता है । ऐसे आहार को प्रय या पूर्ति कहा जाता है । और अधिक क्या कहा जाये, किसी भी दोष से आहार अशुद्ध अनेषणीय - अग्राही हो तो निस्पृह आकांक्षा रहित विवेकशील मुनि उसको संसार का जन्म-मरण का कारण जानकर त्याग दें । आसूणिमक्खिरागं च, गिद्धुवधायकम्मगं । उच्छोलणं च कक्कं च तं विज्जं परिजाणिया ॥१५॥ छाया आशून मक्षिरागञ्च, गृद्धयुपघातकर्मकम् । उच्छोलनञ्च कल्कञ्च तद्विद्वान् परिजानीयात् ॥ अनुवाद रसायन आदि का सेवन करना, सुन्दरता के लिए आँखों में अंजन लगाना, शब्द आदि प्रीतिजनक विषयों में आसक्त रहना, जीव हिंसा मय कर्म करना जैसे शीतल सचित जल से अयत्नपूर्वक हाथ पैर आदि का प्रक्षालन करना, शरीर में पिट्ठी आदि मलना, ये संसार बढ़ाने के कारण हैं। साधु यह जानकर इनका परित्याग करें । - - टीका किञ्च येन घृतपानादिना आहारविशेषेन रसायनक्रियया वा अशूनः सन् आ - समन्तात् शूनी भवति - बलवानुपजायते । तदाशूनीत्युच्यते, यदिवा आसूणिति - श्लाघया क्रियमाणया आ-समन्तात् शूनवच्छूनो लघुप्रकृतिः कश्चिद्दर्पाध्मातत्वात् स्तब्धो भवति, तथा अक्ष्णां 'रागो' रञ्जनं सौवीरादिकमञ्जनमिति यावत्, एवं रसेषु शब्दादिषु विषयेषु वा 'गृद्धिं' गाद्धर्यं तात्पर्यमासेवा, तथोपघातकर्म-अपरापकारक्रिया येन केन चित्कर्मणा परेषां जन्तूनामुपघातो भवति तदुपघातकर्मेत्युच्यते, तदेव लेशतो दर्शयति- 'उच्छोलनं 'त्ति अयतनया शीतोदकादिना हस्तपादादिप्रक्षालनं तथा 'कल्कं' लोघ्रादिद्रव्यसमुदायेन शरीरोद्वर्तनकं तदेतत्सर्वं कर्मबन्धनाये त्येवं 'विद्वान्' पण्डितो ज्ञपरिज्ञया परिज्ञाय प्रत्याख्यानपरिज्ञयापरिहरेदिति ॥१५॥ टीकार्थ घृतपान, अथवा रसायन का सेवन या जिस आहार विशेष के सेवन मनुष्य बलिष्ठ या पुष्ठ होता है, उसे आशूनी कहा जाता है अथवा प्रशंसा को भी आशूनी कहा जाता है क्योंकि ओछी प्रवृत्ति का व्यक्ति अपनी तारीफ सुनकर अहंकार से चूर हो जाता है । आशूनी का सेवन करना, सुन्दरता के लिए नेत्रों में सौवीरक आदि का अंजन लगाना, रसों में अथवा शब्दादि प्रिय विषयों में लोलुप बनना, प्राणियों के उपघातक, उपघात-व्यापादन करने वाले तथा उनके अपकारक- अपकार या बुरा करने वाले कर्म करना, इनके संक्षिप्त स्पष्टीकरण के रूप में अयत्न पूर्वक शीतल सचित जल से हाथ पैर आदि प्रक्षालित करना तथा लोद्र आदि पदार्थों की पीट्ठी बनाकर उसका शरीर पर उद्वर्तन करना, मसलना, ये सभी कर्मबंध के हेतु हैं। विवेकशील मुनि यह जानकर इनका परित्याग करें । - 425
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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