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________________ कशील परिज्ञाध्ययनं निर्वापकयोर्योऽग्निकायमुज्वलयति स बहूनामन्यकायानां समारम्भकः, तथा चागमः "दो भंते ! पुरिसा अन्नमन्नेण सद्धिं अगणिकायं समाभंति तत्थ णं एगे पुरिसे अगणिकायं उज्जालेइ एगे णं पुरिसे अगणिकायं निव्ववेइ, तेसिं भंते ! पुरिसाणं कयरे पुरिसे महाकम्मतराए कयरे वा पुरिसे अप्पकम्मतराए ? गोयमा ! तत्थ णं जे से पुरिसे अगणिकायं उज्जालेइ से णं पुरिसे बहुतरागं पुढ़विकायं समारभति, एवं आउकायं वाउकायं वणस्सइकायं तसकायं अप्पतरागं अगणिकायं समारभइ, तत्थ णं जे से पुरिसे अगणिकायं निव्वावेइ से णं पुरिसे अप्पतरागं पुढविकायं समारभइ जाव अप्पतरागं तसकायं समारभइ जाव अप्परागं तसकायं समारभइ बहुतरागं अगणिकायं समारभइ, ते एतेणं अटेणं गोयमा ! एवं वुच्चइ" । अपि चोक्तम् - "भूयाणं एसमाधाओ, हव्ववाओ ण संसओ" छाया - भूतानामेष आघातो हव्यमानो न संशयः इत्यादि । यस्मादेवं तस्मात् 'मेधावी' सदसद्विवेकज्ञः सश्रुतिक: समीक्ष्य धर्म पापाड्डीनः पण्डितोनाग्निकार्य समार भते, स एव च परमार्थतः पण्डितो योऽग्निकायसमारम्भकृतात् पापान्निवर्तत इति ॥६॥ कथमग्निकायसमारम्भेणापरप्राणिवधो . भवतीत्याशङ्कयाह - टीकार्थ - अग्नि का तपने तपाने व प्रकाश करने आदि में उपभोग है, वह इनका कारण है । जो पुरुष काठ आदि डालकर आग जलाता है वह अग्निकाय के अतिरिक्त पृथ्वी आदि पर आश्रित-विद्यमान स्थावर एवं त्रस प्राणियों का हनन करता है. वह प्राणियों का मन, वचन, काय एवं आयबल तथा इन्द्रिय बलनाश के रूप में घात करता है जो पुरुष जल आदि द्वारा अग्निकाय को बुझाता है, शांत करता है । वह अग्निकाय के जीव को तथा उनके आश्रित जीवों का विनाश करता है । जो आग जलाता है और जो आग बझाता है. इन दोनों में जलाने वाला अग्निकाय के अतिरिक्त अन्य काय के बहुत जीवों का नाश करता है । इस सम्बन्ध में आगम में कहा है-गौतम स्वामी भगवान महावीर से प्रश्न करते हैं, भगवन् ! दो पुरुष अग्निकाय का आरम्भ समारम्भ करते हैं, एक उसे जलाता है तथा दूसरा उसे बुझाता है । इन दोनों में अधिक कर्म किसको लगता है तथा अल्पकर्म किसको लगता है, इसका समाधान देते हुए भगवान् महावीर कहते हैं कि गौतम ! जो पुरुष अग्नि को प्रज्ज्वलित करता है। वह पृथ्वीकाय, अपकाय, वायुकाय, वनस्पतिकाय तथा त्रसकाय का अधिक आरम्भ करता है । उनकी उपेक्षा अग्निकाय का कम आरम्भ करता है । परन्तु जो अग्नि काय को शान्त करता है या बुझाता है वह पृथ्वीकाय, अपकाय, वायुकाय वनस्पतिकाय एवं त्रस काय के जीवों का कम आरम्भअपेक्षाकृत न्यून हिंसा करता है । किन्तु अग्निकाय के जीव का अधिक आरम्भ-हिंसा करता है । वह वस्तुस्थिति है और भी कहा है, इसमें जरा भी संदेह नहीं कि अग्निकाय के आरम्भ से जीवों का विनाश होता है । अतः सत् असत् विवेक सम्पन्न पंडित-विज्ञजन, धर्मतत्व का चिंतन करते हुए अग्निकाय का आरम्भ समारम्भ नहीं करते । जो पाप से निवृत हैं, हटे हुए हैं उन्हें पण्डित कहा जाता है । वे ही वस्तुतः पंडित है जो अग्निकाय का समारम्भ नहीं करते । इस प्रकार पाप से निवृत रहते हैं । अग्निकाय के समारम्भ से अन्य प्राणियों का वध किस प्रकार होता है ? इसे स्पष्ट करते हुए सूत्रकार बतलाते हैं । पुढवीवि जीवा आऊवि जीवा, पाणा य संपाइम संपयंति । संसेयया कट्ठसमस्सिया .य, एते दहे अगणि समारभंते ॥७॥ 371)
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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