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________________ श्री सूत्रकृताङ्गसूत्रम् । गौशालक मतवादी विनय द्वारा ही मोक्ष प्राप्त होना मानते हैं । वे विनय के साथ विचरण करते हैं, इसलिए वैनयिक कहलाते हैं । अज्ञान ही इस लोक और परलोक सिद्धि हेतु पर्याप्त है । उसी से उनकी सिद्धि हो जाती है । यह अज्ञानवादियों का सिद्धान्त है। भगवान महावीर इन सभी मतवादियों के सिद्धान्तों को भलीभांति समझकर तथा बौद्ध आदि अन्य मतों को भी जानकर एवं प्राणियों को उन सबसे अवगत कराकर संयम के सम्यक् परिपालन में निरत रहे। वे अन्य मतवादियों की तरह नहीं थे । वीतराग प्रभु का संस्तवन करते हुये एक जैनाचार्य कहते हैं-प्रभो ! अन्य मतवादियों में जो वक्तृत्व दोष हैं-बोलने में-विवेचन करने में दोष हैं वे आप में नहीं हैं । वे शास्त्रों की रचना करके भी लघुता को ही प्राप्त हुए क्योंकि वे तथा उनके शिष्य जो दूसरों को उपदेश देते हैं, स्वयं अपने सिद्धान्तों के अनुसार आचरण नहीं करते हैं । किन्तु आप जीवन भर संयम के परिपालन में निरत रहे । से वारियाइत्थी सराइभत्तं, उवहाणवं दुक्खखयट्ठयाए । लोगं विदित्ता आरं परं च, सव्वं पभू वारिय सव्ववारं ॥२८॥ छाया - स वारायित्वा स्त्रियां सरात्रिभक्ता मुपधानवान् दुःखक्षयार्थम् । लोक विदित्वाऽऽरं परञ्च सर्वं प्रभु रितवान् सर्ववारम् ॥ अनुताद - भगवान महावीर ने दुःखक्षयार्थ अष्टविध कर्मों के क्षय हेतु स्त्री भोग तथा रात्रि भोजन का परित्याग कर दिया था । वे सदैव तपश्चरण में प्रवृत रहे । इस लोक और परलोक के स्वरूप को जानकर उन्होंने सब प्रकार के पापों का परिवर्जन किया । टीका - स भगवान् वारयित्वा-प्रतिषिध्य किं तदित्याह-'स्त्रियम्' इति स्त्रीपरिभोगं मैथुनमित्यर्थः, सह रात्रिभक्तेन वर्तन इति सरात्रिभक्तं, उपलक्षणार्थ--त्वादस्यान्यदपि प्राणातिपातनिषेधादिकं द्रष्टव्यं, तथा उपधान-तपस्तद्विद्यते यस्यासौ उपधानवान्-तपोनिष्टप्तदेहः, किमर्थमिति दर्शयति-दुःखयतीति दुःखम्-अष्टप्रकारं कर्म तस्य क्षय:-अपगमस्तदर्थं, किञ्च-लोकं विदित्वा 'आरम्' इहलोकाख्यं 'परं' परलोकाख्यं यदि वाआरं-मनुष्यलोकं पारमिति-नारकादिकं स्वरूपतस्तत्प्राप्तिहेतुतश्च विदित्वा सर्वमेतत् 'प्रभु' भगवान् ‘सर्ववारं' बहुशो निवारितवान्, एतदुक्तं भवति-प्राणातिपातनिषेधादिकं स्वतोऽनुष्ठाय परांश्च स्थापितवान्, न हि स्वतोऽस्थितः परांश्च स्थापयितुमलमित्यर्थः, तदुक्तम् - "ब्रुवा णोऽपि न्याय्यं स्ववचनविरुद्धव्यवहरन्, परान्नालं कश्चिद्दमयितुमदान्तः स्वयमिति । भवान्निश्चित्यैवं मनसि जगदाधाय सकलं, स्वमात्मानं तावद्दमयितुमदान्तं व्यवसितः ॥१॥" इति, सथा-"तित्थयरो चउनाणी सुरमहिओ सिज्झियव्यवधूयंमि । अणिगूहियबलविरओ सव्वत्थामेसु उज्जमइ १॥ इत्यादि" ॥२८॥ साम्प्रतं सुधर्मस्वामीतीर्थकरगुणानाख्याय स्वशिष्यानाह टीकार्थ - भगवान महावीर ने नारी भोग तथा रात्रि भोजन का परित्याग कर दिया था । यह उपलक्षण मात्र है । इससे संकेतित है कि उन्होंने प्राणतिपात-हिंसा आदि अन्य पापों का भी परित्याग कर दिया था । उन्होंने तपश्चरण से अपने शरीर को तपा डाला । ऐसा उन्होंने क्यों किया ? इसका दिग्दर्शन कराते हुए सूत्रकार कहते हैं । जो प्राणियों को दुःख देता है उसे दु:ख कहा जाता है । इसका आशय आठ प्रकार के कर्मों से है । उनका क्षय करने के लिए भगवान ने ऐसा किया । उन्होंने इस लोक और परलोक को जानकर अथवा । मनुष्य लोक तथा नरक आदि के स्वरूप एवं उनके प्राप्त होने के कारणों को जानकर, तन्मूलक समग्र पापों 364
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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