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________________ नरकविभक्ति अध्ययन अनुवाद - जिस प्राणी ने जैसा कर्म किया है आगे के जन्म में उसको वैसा ही फल मिलता है । जिसने एकान्त दुःखात्मक नरक योनि में ले जाने वाला कर्म किया है, वह अनन्त दुःखमय नरक में जाता है, फल भोगता है। ___टीका - 'यत्' कर्म 'यादृशं' यदनुभावं यादृक् स्थितिक् वा कर्म 'पूर्व' जन्मान्तरे 'अकार्षीत् ' कृतवांस्तत्रत्ताहगेव जघन्यमध्यमोत्कृष्टस्थित्यनुभावभेदं 'सम्पराये' संसारे तथा तेनैव प्रकारेणानुगच्छति, एतदुक्तं भवति तीव्रमन्दमध्यमैर्बन्धाध्यवसायस्थानैर्याद्दशैर्यद्वद्धं तत्ताहगेव तीव्रमन्दमध्यमेव विपाकम्-उदयमा गच्छतीति, एकान्तेन-अवश्यं सुखलेशरहितं दुःखमेव यस्मिन्नरकादिके भवेस तथा तमेकान्त दुःखं 'भवमर्जयित्वा' नरकभवोपादानभूतानि कर्माण्युपादायैकान्तदुःखिनस्तत्पूर्व निर्दिष्टं दुःखम्-असातवेदनीय रूपमनन्तम्-अनन्योपशमनीय मप्रतिकारं 'वेदयन्ति' अनुभवन्तीति ॥२३|| पुनरप्युपसंहारव्याजेनोपदेशमाह टीकार्थ - जीवों ने अपने पूर्व जन्म में जैसी स्थितियुक्त, जैसा प्रभावापन्न कर्म किया है वह वैसा ही जघन्य, मध्यम व उत्कृष्ट स्थिति युक्त तथा जघन्य मध्यम और उत्कृष्ट प्रभावयुक्त उसी तरह उन्हें उसका फल प्राप्त होता है । कहने का अभिप्राय यह है कि तीव्र, मन्द और मध्यम जैसे अध्यवसायों-परिणामों से जो कर्म बांधा गया है उसका तीव्र मन्द और मध्यम विपाक युक्त फल उत्पन्न होता है-प्राप्त होता है । जिन जीवों ने सुख के लेश से भी शून्य एकान्त रूप से दुःखमय नरक योनि के कारण स्वरूप कर्मों का अनुष्ठान किया है, वे एकान्त रूप से दुःखित होकर पूर्वोक्त असातावेदनीय रूप, कष्ट भोगते हैं, जिसका कोई अन्त नहीं होता । जो किसी के द्वारा उपशान्त नहीं किये जा सकते हैं । जिसका कोई प्रतिकार नहीं किया जा सकता। एताणि सोच्चा णरगाणि धीरे, न हिंसए किंचण सव्वलोए । एगंत दिट्ठी अपरिग्गहे उ, बुझिज लोयस्स वसं न गच्छे ॥२४॥ छाया - एतान् श्रुत्वा नरकान् धीरो, न हिंस्यात्कञ्चन सर्वलोके । एकान्त दृष्टिरपरिग्रहस्तु, बुध्येत लोकस्य वशं न गच्छेत् ॥ अनुवाद - धीर-धैर्यशील विज्ञजन इन नरकों के सम्बन्ध में सुनकर किसी भी जीव की हिंसा न करें। वह जीव आदि तत्व में भली भांति श्रद्धा रखता हुआ परिग्रह रहित होकर लोक का स्वरूप जाने । टीका - ‘एतान्' पूर्वोक्तान्नरकान् तास्थ्यात्तव्यपदेश इतिकृत्वा नरकदुःखविशेषान् 'श्रुत्वा' निशम्य धी:-बुद्धिस्तया राजत इति धीरो-बुद्धिमान् प्राज्ञः, एतत्कुर्यादिति दर्शयति-सर्वस्मिन्नपि-त्रसस्थावरभेदभिन्ने 'लोके' प्राणिगणे न कमपि प्राथिनं 'हिंस्यात्' न व्यापादयेत्, तथैकान्तेन निश्चला जीवादितत्त्वेषु दृष्टिः-सम्यगदर्शनं यस्य स एकान्तदृष्टिः निष्प्रकम्पसम्यकत्व इत्यर्थः, तथा न विद्यते परि-समन्तात्सुखार्थं गृह्यत इति परिग्रहो यस्यासौ अपरिग्रहः, तुशब्दादाद्यन्तोपादानाद्वा मृषावादादत्तादानमैथुनवर्जनमपि द्रष्टव्यं, तथा लोकम्' अशुभकर्मकारिणं तद्विपाकफलभुजं वा यदिवा-कषायलोकं तत्स्वरूपतो 'बुध्येत' जानीयात् न तु तस्य लोकस्य वशं गच्छेदिति ॥२४॥ एतदनन्तरोक्तं दु:खविशेषमन्यत्राप्यतिदिशन्नाह - टीकार्थ - सूत्रकार पुनः इस उद्देशक की समाप्ति के संदर्भ में प्रतिपादन करते हैं । जिनका पहले वर्णन किया गया है, उन नरकों को अर्थात् उनमें होने वाले दुःखों को सुनकर बुद्धिमान पुरुष ऐसा कार्य करे। 341
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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