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________________ श्री सूत्रकृताङ्ग सूत्रम् अनुवाद - परमाधामी देव आर्त स्वर में करुण क्रन्दन करते हुए उन ज्ञान शून्य नारकीय प्राणियों को खून और मवाद से भरी हुई कुंभी में डाल देते हैं और पकाते हैं । तृष्णा-प्यास से आदित-पीड़ित उन नारकियों को वे सीसा और तांबा गलाकर पिलाते हैं । इसलिए वे नारकीय प्राणी और अधिक चिल्लाते हैं । टीका - 'तासु' प्रत्यग्राग्निप्रदीप्तासु लोहितपूयशरीरावयवकिल्बिषपूर्णासु दुर्गन्धासु च 'बालान् । नारकांस्त्राणरहितान आर्तस्वरान करुणं-दीनं रसतः प्रक्षिप्य प्रपचन्ति, 'ते च' नारकास्तथा कदर्थ्यमाना बिरसमाक्रन्दन्तस्तृडार्ताः सलिलं प्रार्थयन्तो मद्यं ते अजीव प्रियमासीदित्येवं स्मरयित्वा तप्तं पाय्यन्ते, ते च तप्तं त्रपु पाय्यमाना आर्ततरं 'रसन्ति' रारटन्तीति ॥२५॥ उद्देशकार्थोपसंहारार्थमाह - टीकार्थ - नरकपाल नवीन अग्नि के सदृश प्रदीप्त-दहकती हुई, खून मवाद और देह के अंगों एवं गंदे पदार्थों से भरी हुई, दुर्गन्ध युक्त उस कुंभी में आर्त स्वर में करुण क्रन्दन करते हुए उन ज्ञान शून्य नारकीय प्राणियों को जिन्हें वहाँ कोई बचाने वाला नहीं हैं । डालकर पकाते हैं । वे नारकीय जीव उस प्रकार पीडित किये जाने पर बुरी तरह चीखते चिल्लाते हैं । वे जब त्रिशाकुल-प्यास से पीडित होकर पानी मांगते हैं तब नरक पाल उन्हें यह याद दिलाते हुये कि तुमको मदिरा बहुत प्रिय थी, परितप्त- गलाया हुआ सीसा और तांबा पिलाते हैं । वे उन्हें पीते हुए बड़े जोर से आर्त स्वर में चिल्लाते हैं। इस उद्देशक की विषय वस्तु का उपसंहार करते हुए कहते हैं । अप्पेण अप्पं इह वंचइत्ता, भवाहमे पव्वसते सहस्से । चिटुंति तत्था बहुकूरकम्मा, जहा कडं कम्म तहासि भारे ॥२६॥ छाया - आत्मानाऽऽत्मानमिह वञ्चयित्वा भवाधमान् पूर्वं शतसहस्त्रशः । तिष्ठन्ति तत्र बहुक्रूरकर्माणः, यथाकृतं कर्म तथाऽस्य भाराः ॥ अनुवाद - इस मनुष्य जीवन में नगण्य सुख के लालच में जो दूसरों को वंचित करते हैं-धोखा देते हैं, सैंकड़ों हजार बार लुगधक-आखेट जीवी जैसे निम्न स्थानों में जन्म प्राप्त करते हैं, पुनश्च नरक में जाते हैं । जिसने पूर्वजन्म में जैसे कर्मों का आचरण किया है उसे आगे वैसा ही फल मिलता है । टीका - 'अप्पेण'इत्यादि, 'इह' अस्मिन्मनुष्यभवे 'आत्मना' परवञ्चनप्रवृत्तेन स्वत एव परमार्थत आत्मानं वञ्चयित्वा 'अल्पेन' स्तोकेन परोपघातसुखेनात्मानं वञ्चयित्वा बहुशो भवानां मध्ये अधमा. भवाधमाः -मत्स्यबन्धलुब्धकादीनां भवास्तान् पूर्वजन्मसु शतसहस्त्रशः समनुभूय तेषु भवेषु विषयोन्मुखतया सुकृतपराङ्मुखत्वेन चावाप्य महाघोरातिदारूणं नराकावासं 'तत्र' तस्मिन्मनुष्याः 'क्रूरकर्माण:' परस्परतो दुःखमदीरयन्तः प्रभूतं कालं यावत्तिष्ठन्ति, अत्र कारणमाह 'यथा' पूर्वजन्मस याहाभतेनाध्यवसायेन जघन्यजघन्य तरादिना कतानि कर्माणि 'तथा' तेनैव प्रकारेण 'से' तस्य नारकजन्तोः 'भारा' वेदनाः प्रादुर्भवन्ति स्वतः परत उभयतो वेति, तथाहिमांसादाः स्वमांसान्येवाग्निप्रताप्य भक्ष्यन्ते, तथा मांसरसपायिनो निजपूयरूधिराणि तपप्तत्रपूणि च पाय्यन्ते, तथा मत्स्यघातकलुब्धकादयस्तथैव छिद्यान्ते भिद्यन्ते यावन्मार्यन्त इति, तथाऽनृतभाषिणां तत्स्मारयित्वा जिह्वाश्चेच्छिद्यन्ते, [ग्रन्थानम् ४०००] तथा पूर्वजन्मनि परकीयद्रव्यापहरिणामङ्गोपाङ्गायपहिन्ते तथा पारदारिकाणां वषणच्छेदः शाल्मल्युपगूहनादि च ते कार्यन्ते एवं महापरिग्रहारम्भवतां क्रोधमानमायालोभिनां च जन्मांतरस्वकृतक्रोधादिदुष्कृत (324)
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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