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________________ - श्री सूत्रकृताङ्ग सूत्रम् अस्थिर हो जाता है । कहा है सम्बन्धी जन वास्तव में मित्र या हितकारक नहीं हैं । वे अमित्र हैं-अहित करने वाले हैं । किन्तु मित्र की ज्यों गले में बांह डालकर रोते हैं, मानो वे कहते हो कि मित्र ! सद्गति की ओर, उत्तम गति की ओर कदम मत रखो, आओ, हम तुम दोनों दुर्गति की दिशा में बढ़ चले।। विबद्धो नातिसंगेहि, हत्थीवावी नवग्गहे । पिट्ठतो परिसप्पंति, सुयगोव्व अदूरए ॥११॥ छाया - विबद्धो ज्ञातिसंगैर्हक्तीवाऽपि नवग्रहे । __ पृष्ठतः परिसर्पन्ति सूतगौरिवादूरपा ॥ .. अनुवाद - जो पुरुष अपने पारिवारिक जनों के मोह में बंधकर संयममय जीवन का परित्याग कर देता है, पुनः अपने घर में चला जाता है, उसके स्वजन वृन्द नये पकड़े हुए हाथी के समान उसकी बड़ी अच्छी तरह देखभाल करते हैं, उसके पीछे लगे रहते हैं, जैसे नवप्रसूता गाय अपने बछड़े के नजदीक लगी रहती है, उसी प्रकार उसके रिश्तेदार उसके नजदीक रहते हैं । टीका - विविध बद्धः-परवशीकृतः विबद्धो ज्ञातिसङ्गैः-मातापित्रादि सम्बन्धैः, ते च तस्य तस्मिन्नवसरे सर्वमनुकूलमनुतिष्ठन्तो धृतिमुत्पादयन्ति हस्तिवापि 'नवग्रहे' अभिनवग्रहणे, (यथा स) धृत्युत्पादनार्थमिक्षुश कलादिभिरूपचर्यते, एवमसावपि सर्वानुकूलरूपायैरूपचर्यते, दृष्टान्तान्तरमाह-यथाऽभिनवप्रसूता गौर्निजस्तनन्धयस्य 'अदूरगा' समीपवर्तिनी सती पृष्ठतः परिसर्पति, एव तेऽपि निजा उत्प्रव्रजितं पुनर्जातमिव मन्यमानाः पृष्ठतोऽनुसर्पन्तितन्मार्गानुयायिनो भवन्तीत्यर्थः ॥११॥ टीकार्थ - माता-पिता आदि के संबंध से-तद्गत आसक्ति के कारण वह विविध रूप में बंधा हुआ साधु परवश, परतन्त्र हो जाता है । अपने पर अपना अधिकार खो देता है । वे सम्बन्धी जन तब उसके प्रति अनुकूल-प्रिय व्यवहार करते हुए उसे परितुष्ट संतुष्ट करने का प्रयास करते हैं । जिस प्रकार नये पकड़े हुए हाथी को परितुष्ट करने हेतु पकड़ने वाले उसे गन्ने के टुकड़े आदि मीठी चीजें खिलाकर उसकी परिचर्या करते है, उसी प्रकार पारिवारिक गण अनुकूल-उसके मन को भाने वाले उपायों द्वारा उसकी परिचर्या करते हैं, इस संबंध में एक ओर दृष्टान्त दिया जा रहा है-जिस प्रकार नव प्रसूता गाय अपने बछड़े के निकट रहती हुई उसके पीछे-पीछे दौड़ती फिरती है, उसी प्रकार परिवार के लोग भी संयम छोड़कर आए हुए उस साधु को नवजात-नये जन्मे हुए की तरह उसके पीछे पीछे फिरते हैं । वह जिस रास्ते से जाता है, उसी से वे जाते. हैं-उसके अनुकूल बने रहते हैं । एते संगा मणूसाणं, पाताला व अतारिमा । कीवा जत्थ य किस्संति, नाइसगेहिं मुच्छिया ॥१२॥ छाया - एते सङ्गाः मनुष्याणां पाताला इवातार्याः । ___ क्लीबाः यत्र क्लिश्यन्ति ज्ञाति सङ्गैर्मूर्छिताः ॥ (216)
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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