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________________ उपसर्गाध्ययनं तृतीयोपसर्गपरिज्ञाध्ययन प्रथम उद्देशकः सूरं मण्णइ अप्पाणं, जाव जेयं न पस्सती । जुझंतं दढधम्माणं, सिसुपालो व महारहं ॥१॥ छाया - शूरं मन्यत आत्मानं यावज्जेतारं न पश्यति । युध्यन्तं दृढ़धर्माणं शिशुपाल इव महारथम् ॥ अनुवाद - कायर पुरुष तभी तक अपने को शूर-बहादुर मानता है, जब तक वह जेत्ता-विजयशील पुरुष को नहीं देखता । जब वह विजयशील पुरुष को देखता है तो वह वैसे ही ध्वस्त हो उठता है जैसे दृढ़ धर्मा महारथी कृष्ण को देखकर शिशुपाल हो उठा था । टीका - कश्चिल्लघुप्रकृतिः सङ्ग्रामे समुपस्थिते शूर मात्मानं मन्यते-निस्तोयाम्बुद इवात्मश्लाघा प्रवणो वाग्भिर्विस्फूर्जन् गर्जति, तद्यथा-न मत्कल्पः परानीके कश्चित् सुभतोऽस्तीति, एवं तावद्गर्जति यावत् पुरोऽवस्थितं प्रोद्यतासिं जेतारं न पश्यति, तथा चोक्तम् - "तावद्गजः प्रस्तुतदानगण्डः करोत्यकालाम्बुदगर्जितानि । यावन्न सिंहस्य गुहास्थलीषु लाङ्गलविस्फोटरवं शृणोति ॥१॥" न दृष्टान्तमन्तरेण प्रायो लोकस्यार्थावगमो भवतीत्यतस्तदवगतये दृष्टान्तमाह-यथा माद्रीसुतः शिशुपालो वासुदेवदर्शनात्प्राग् आत्मश्लाघा प्रधानं गर्जितवान्, पश्चाच्च युग्यमानं-शस्त्राणि व्यापारयन्तं दृढः-समर्थो धर्मः स्वभावः सङ्ग्रामाभङ्गरूपो यस्य स तथा तं महान् रथोऽस्येति महारथः, स च प्रक्रमादत्र नारायणस्तं युध्यमानं दृष्ट्वा प्राग्र्जना प्रधानोऽपि क्षोभं गतः, एवंमुत्तरत्र दाान्तिकेऽपि योजनीयमिति । भावार्थस्तु कथानकाद वसेयः, तच्चेदम्-वसुदेवसुसाएँसुओ दमघोषणराहिवेण मद्दीए । जाओ चउब्भुओऽभुयबलकलिओ कलहपत्तट्ठो ॥१॥ दतॄण तओ जणणी चउब्भुयं पुत्तमब्भुयमणग्छ । भयहरिसविम्हयमुही पुच्छईणेमित्तियं सहसा ॥२॥णेमित्तिएण मुणिऊण साहियं तीइ हट्ठहिययाए । जह एस तुब्भ पुत्तो महाबलो दुजओ समरे ॥३॥ एयस्स य जं दट्ठण होइ साभावियं भुयाजुयलं । होही तओ चिय भयं सुतस्स ते णत्थि संदेहो ॥४॥ सावि भयवेविरंगी पुत्तं दंसेइ जाव कण्हस्स । तावच्चिय तस्य ठियं पयइत्थं वरभुयाजुयलं ॥५॥ तो कण्हस्स पिउच्छा. पुत्तं पाढेइ पाय पीढंमि । अवराह खामणत्थं सोवि सयं से खमिस्सामि ॥६॥ सिसुवालो वि हु जुव्वणमएण नारायणं असब्भेहिं । वयणेहिं भणई सोविहु खमई खमाए समत्थोवि ॥७॥ अवराहसए पुण्णे वारिजंतो ण चिट्ठई जाहे । कण्हेण तओ छिन्नं चक्केणं उत्तमंगं से ॥८॥ साम्प्रतं सर्वजन प्रतीतं वार्तमानिकं दृष्टान्त माह - टीकार्थ - कोई लघु प्रवत्ति-हीन स्वभावयुक्त पुरुष सङग्राम का समय उपस्थित होने पर अपने को बहादुर मानता हुआ, उसी तरह खूब गर्जता है जैसे जल रहित मेघ गड़गड़ाता है, वह कहता है कि शत्रु की सेना में मेरे सदृश कोई भी योद्धा नहीं है, किन्तु उसकी यह गर्जना तभी तक चलती है, जब तक खङ्ग हाथ में लिए किसी विजयी पुरुष को अपने आगे खड़ा नहीं देखता । कहा गया है-मद जल से जिसका कपोल -197
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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