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________________ वैतालिय अध्ययनं अनन्तरोक्तमार्गानुष्ठानेनानन्ताः सिद्धा अशेषकर्मक्षयभाजः संवृत्ताः विशिष्टस्थानभाजो वा तथा सम्प्रति वर्तमाने काले सिद्धिगमनयोग्ये सिद्ध्यन्ति अपरे वा अनागते काले एतन्मार्गानुष्ठायिन एव सेत्स्यन्ति, नापर: सिद्धिमार्गोऽस्तीति भावार्थ: ॥२१॥ टीकार्थ • आगमकार पूर्व वर्णित गुणों का उल्लेख करते हुए कहते हैं- मन, वचन और शरीर द्वारा अथवा कृतकारित और अनुमोदन द्वारा यों तीन योग और तीन करण द्वारा दसविध प्राणधारक प्राणियों का हनन व्यापादन नहीं करना चाहिये । यह प्रथम महाव्रत है । इसके उपलक्षण द्वारा अवशिष्ट चार महाव्रतों को भी जान लेना चाहिये । जो आत्मा के लिये हित-कल्याण में संलग्न है, वैसा आत्मकल्याणार्थी अनिदान स्वर्ग प्राप्ति आदि की अभिलाषा या संकल्प से वर्जित पुरुष इन्द्रिय, नोइन्द्रिय, मन, वचन तथा काया- इन्हें गुप्त रखे, असत् कार्यों से दूर रखे-बचाये रहे । जो ऐसा करता है वह अवश्य ही सिद्धि को प्राप्त करता है । इसका स्पष्टीकरण करते हुए कहते हैं कि पूवोक्त- पहले कहे गये मार्ग का अनुसरण करते हुए अनन्त पुरुषों ने अपने कर्मों का क्षय किया, सिद्धत्व प्राप्त किया। दूसरे शब्दों में विशिष्ट - अलौकिक अनुपम स्थान का लाभ किया । वर्तमान समय में भी सिद्धि प्राप्त करने योग्य क्षेत्र में साधक पूर्व वर्णित उपायों द्वारा सिद्धि प्राप्त करते हैं- मुक्ति लाभ करते हैं । भविष्यकाल में भी उस पथ का अनुसरण करते हुए अनन्त जीव सिद्ध होंगे। इससे अलग कोई सिद्धि का पथ नहीं है । एवं से उदाहु अणुत्तरनाणी अणुत्तरदंसी अणुतरणाण दंसणधरे । अरहा छाया 44 - अनुवाद अणुत्तर ज्ञानी - सर्वोत्तम ज्ञान के स्वामी, अणुत्तर दर्शनी - सर्वोत्तम दर्शन के स्वामी, उत्तम ज्ञान, उत्तम दर्शन के धारक, अर्हत् - देवाधिपूज्य ज्ञातपुत्र भगवान महावीर ने वैशालीनगरी में यह उपदेश दिया था । ऐसा मैं कहता हूँ । टीका एतच्च सुधर्मस्वामी जम्बूस्वामिप्रभृतिभ्यः स्वशिष्येभ्यः प्रतिपादयतीत्याह - ' एवंसे' इत्यादि, एवम् उद्देशकत्रयाभिहितनीत्या स ऋषभस्वामी स्वपुत्रानुद्दिश्य उदाहृतवान् प्रतिपादितवान् । नाऽस्योत्तरं प्रधानमस्तीत्यनुत्तरं तच्च तज्ज्ञानञ्च अनुत्तरज्ञानं तदस्याऽस्तीत्यनुत्तरज्ञानी स तथाऽनुतरदर्शी, सामान्य- विशेष परिच्छेदकाववोधस्वभाव इति बौद्धमतनिरासद्वारेण ज्ञानाधारं जीवं दर्शयितुमाह- अनुत्तरज्ञानदर्शनधर इति कथञ्चिद्भिन्नज्ञानदर्शनाधार इत्यर्थः । अर्हन् सुरेन्द्रादिपूजार्हो ज्ञातपुत्रो वर्द्धमान स्वामी ऋषभस्वामी वा भगवान् ऐश्वर्य्यादिगुणयुक्तो विशाल्यांनगर्यां वर्धमानोऽस्माकमाख्यातवान् ऋषभस्वामीवा विशालकुलोद्भवत्वाद् वैशालिकः तथा चोक्तम् - 'विशाला जननी यस्य विशालं कुलमेव वा विशालं वचनं चास्य तेन वैशालिको जिन: ?" एवमसौ जिन आख्यातेति । इति शब्दः परिसमाप्त्यर्थो ब्रवीमीति उक्तार्थो नयाः पूर्ववदिति ॥२२॥ टीकार्थ आर्य सुधर्मा श्री जम्बू आदि अपने शिष्यों को जो कहते हैं, वह बताने हेतु आगम प्रतिपादित करते हैं - नायपुत्ते भगवं वेसालिए वियाहिए ॥ २२ ॥ त्तिबेमि ॥ एवं स उदाहृतवान्ननुतर ज्ञान्यनुत्तरदर्शी अनुत्तरज्ञान दर्शनधरो । अर्हन् ज्ञातपुत्रो भगवान् वैशालिक आख्यातवानिति ॥ इति ब्रवीमि ॥ - - 195
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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