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________________ श्री सूत्रकृताङ्ग सूत्रम् । मूढस्तत्तत्करोति येन पुनः पुनः दुःखी संसारसागरमनन्तमभ्येति, तमेवंभूतं मोहं परित्यज्य सम्यगुत्थानेनोत्थायनिर्विद्येत जुगुप्सयेत् परिहरेदात्मश्लाघां स्तुतिरूपां तथा पूजनं वस्तादि लाभरूपं परिहरेद् एवमनन्तरोक्तया नीत्या प्रवर्तमानः सह हितेन वर्तत इतिसहितो ज्ञानादियुक्तो वा संयतः प्रव्रजितोऽपरप्राणिभिः सुखार्थिभिः आत्मतुलामात्मतुल्यतां दुःखाप्रियत्व सुख प्रियत्वरूपामधिकं पश्येत्, आत्म तुल्यान् सर्वानपि प्राणिनः पालयेदिति ॥१२॥ टीकार्थ - शास्त्रकार पुनः दूसरे प्रकार से प्रतिपादित करते हैं - जो असातावेदनीय कर्म उदयावस्था को प्राप्त होते हैं उन्हें दुःख कहा जाता है अथवा उसका कारण दुःख कहा जाता है । जो प्राणी को अप्रिय या बुरा लगता है, वह उसे दुःख समझता है । वह दुःख जिसे होता हो वह प्राणी दु:खी कहा जाता है । दुःखित प्राणी पुनःपुनः मोहमूढ बनता है, वह सत्, असत् के विवेक से रहित होता है, कहने का अभिप्राय यह है कि असातवेदनीय कर्म के उदय से पीडित होकर मोह मूढ जीव ऐसा कर्म करता है, जिससे वह पुनः पुनः दुःख प्राप्त करता है । जिसका कोई अंत नहीं ऐसे संसार सागर को प्राप्त करता है, उसमें भटकता है । अतः विवेकशील पुरुष इस प्रकार के मोह का परित्याग कर सम्यक् उत्थान से उत्थित होकर-सम्यकज्ञान के बल पर सच्चर्याशील बनकर अपनी स्तवना-प्रशंसा वस्रादि द्वारा मान सम्मान आदि का परित्याग करे ।। इस पूर्वोक्त रीति-पद्धति से प्रवृत्त होता हुआ अपने आत्मकल्याण में लीन रहता हुआ ज्ञानादि सम्पन्न साधु अन्य सभी प्राणियों को अपनी आत्मा के समान ही सुखप्रिय लगते हैं तथा दुःख अप्रिय लगते हैं-ऐसा समझे । कहने का अभिप्राय यह है कि साधु सभी प्राणियों को अपने तुल्य ही सुखप्रिय तथा दुःखद्वेषी माने, उनका पालन करे-हिंसादि द्वारा हानि न पहुँचाये । गारं पिअ आवसे नरे, अणुपुव्वं पाणेहिं संजए । समता सव्वत्थ सुव्वते देवाणं गच्छे स लोगयं ॥१३॥ छाया - अगार मप्यावसन्नर आनुपूर्व्या प्राणेषु संयतः । समतां सर्वत्र सुव्रतो देवानां गच्छेत्स लोकम् ॥ अनुवाद - जो पुरुष अगार-गृह में निवास करता हुआ भी क्रमशः आगार धर्म को प्राप्त करता हुआश्रमणोपासक के व्रतों को ग्रहण करता हुआ प्राणियों की हिंसा से पृथक् होता है, निवृत्त होता है, वह सर्वत्र समत्वभाव रखता है । वैसा उत्तम व्रत युक्त परुष देवताओं के लोक में जाता है। टीका - किञ्च अगारमपि गृहमप्यावसन् गृह वासमपि कुर्वन् नरो मनुष्यः अनुपूर्वमिति आनुपूर्व्या श्रवणधर्मप्रतिपत्त्यादिलक्षणया प्राणिषु यथा शक्त्या सम्यक् यतः संयत तदुपमन्निवृत्तः किमिति ? यतः समता स्वभावः आत्मपरतुल्यता सर्वत्र यतौ गृहस्थे च यदि वैकेन्द्रियादौ श्रूयतेऽभिधीयते आर्हते प्रवचने, ताञ्च कुर्वन् स गृहस्थोऽपि सुव्रतः सन् देवानां पुरन्दरादीनां लोकं स्थानं गच्छेत्, किं पुन र्यो महासत्त्वतया पञ्चमहाव्रतधारी यतिरिति ॥१३॥ टीकार्थ - जो पुरुष घर में भी निवास करता हुआ-गृहस्थ जीवन में भी रहता हुआ क्रमशः श्रावक धर्म को स्वीकार करता है, यथाशक्ति-अपने सामर्थ्य अनुरूप प्राणियों की हिंसा से विरत होता है, आहत प्रवचनोक्त 188
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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