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________________ वैतालिय अध्ययन छाया - ये इह सातानुगाः नराः अध्युपपन्नाः कामेषु मूर्छिताः । . कृपणेन समं प्रगल्भिताः नाऽपि जानन्ति समाधिमाख्यातम् ॥ अनुवाद - इस संसार में जो पुरुष सातानुगामी-सुख के पीछे चलने वाले हैं, समृद्धि वैभवादि में अध्युपपन्नआसक्त हैं तथा विषय भोग में मूर्च्छित हैं, जो कृपण-दयनीय इंद्रिय भोगों में लोलुप जनों के समान है वे धृष्टतापूर्वक विषय वासना के सेवन में लगे रहते हैं । ऐसे लोग समझाये जाने पर भी धर्म ध्यान को आत्मसात नहीं कर पाते । टीका - किञ्च ये नरा लघुप्रकृतयः 'इह' अस्मिन् मनुष्यलोके सातं सुखमनुगच्छन्तीति सातानुगा सुखशीला ऐहिकामुष्मिकापायभरवः समृद्धिरससातागौरवेषु 'अध्युपपन्ना गृद्धाः' तथा 'कामेषु' इच्छामदनरूपेषु 'मूर्च्छिता' कामोत्कटतृष्णाः कृपणो दीनो वराकक इन्द्रियैः पराजितस्तेन समा:तद्वत्कामासेवने 'प्रगल्भिताः' धृष्टतां गताः, यदि वा किमनेन स्तोकेन दोषणासम्यक्प्रत्युपेक्षणादिरूपेणास्मत्संयमस्य विराधनं भविष्य त्येवं प्रमादवन्तः कर्तव्यष्ववसीदन्तः समस्तमपि संयमं पटवन्मणिकुट्टिमवद्धा मलिनी कुर्वन्ति, एवम्भूताश्च ते 'समाधि' धर्मध्यानादिकम् 'आख्यातं' कथित मपि न जानन्तीति ॥४॥ टीकार्थ - इस मनुष्य लोक में जो मानव लघु प्रकृति-तुच्छ या हीन प्रकृति युक्त होते हैं, एहिक एवं पारलौकिक दुःखों से संत्रस्त होते हुए भौतिक सुखों के पीछे चलते रहते हैं, जो समृद्धि रस साता एवं गौरव में आसक्त रहते हैं-विषय भोगों में उत्कट, तीव्र तृष्णायुक्त हैं, वे इंद्रियों से पराजित-उनके वशीभूतदीन आत्मबल रहित पुरुष के समान धृष्टतापूर्वक सांसारिक भोगों के सेवन में लगे रहते हैं अथवा जो पुरुष ऐसा समझते हैं कि प्रतिलेखनादि समितियों का भली भांति परिपालन नहीं करना तो एक छोटा सा दोष है। उससे हमारा संयम कैसे नष्ट हो सकता है, ये उनका प्रमाद है । वे इस प्रकार करते हुए रत्नों से खचित प्रांगण की ज्यों निर्मल संयम को मलिन कर डालते हैं । ऐसे लोग कहने पर भी-सावधान किये जाने पर भी धर्मध्यान आदि का महत्त्व नहीं समझते वाहेण जहावविच्छए, अबले होइ गवं पचोइए । से अंतसो अप्पथामए, नाइवहइ अबले विसीयति ॥५॥ छाया - वाहेन यथावक्षितोऽबलो भवति गौ प्रचोदितः । सोऽन्तसोऽल्पस्थामा नातिवहत्यबलो विषीदति ॥ अनुवाद - जैसे एक गाडीवान एक कमजोर बैल को कोडे या चाबुक से पीटकर चलने को प्रेरित करता है, किंतु वह बैल दुर्बलता के कारण कठिन मार्ग को पार नहीं कर सकता । वह अल्प शक्तियुक्तकमजोर होने के कारण विषम मार्ग-कीचड़ आदि में फंसकर दुःख पाता है, भार वहन नहीं कर सकता । टीका - पुनरप्युपदेशान्तरमधिकृत्याह - 'व्याधेन' लुब्धकेन 'जहा व' त्ति यथा 'गव' न्ति मृगादिपशुर्विविधमनेकप्रकारेण कूटपाशादिना क्षतः पर वशीकृतः श्रमं वा ग्रहितः प्राणोदितोऽप्यबलो भवति, जातश्रमत्वात् गन्तुमसमर्थः, यदिवा वाहयतीति वाहः शाकटिकस्तेन यथावदवहन् गौ विविध प्रतोदादिना क्षतः प्रचोदितोऽप्यबलो विषमपथादौ गन्तुमसमर्थो भवति, 'सचान्तशः' मरणान्तमपि यावदल्पसामो नातीव वो, शक्नोति, एवम्भूतश्च 'अबलो' भारं वोढुम समर्थः तत्रैव पङ्कादौ विषीदतीति ॥५॥ 181)
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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