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________________ श्री सूत्रकृताङ्ग सूत्रम् तृतीय. उद्देशकः , टीका - अथ वैतालीयाध्ययनस्य तृतीयोद्देशकस्य प्रारंभः - उक्तो द्वितीयोद्देशकः, साम्प्रतं तृतीयः समारभ्यते अस्य चायमभिसम्बन्धः-इहानन्तरोद्देशकान्ते विरता इत्युक्तं, तेषां च कदाचित्परीषहाः समुदीयेरन् अत: तत्सहनं विधेयमिति, उद्देशकार्थाधिकारोऽषि नियुक्तिकारणाभिहित: यथाऽज्ञानोपचितस्य कर्मणोऽपचयो भवतीति, सच परीषहसहनादेवेत्यतः परीषहाः सोढव्या इत्येनेन सम्बन्धेनाऽऽयातस्यास्योद्देशकस्यादिसूत्रम् । टीकार्थ - वैतालीय अध्ययन का तीसरा उद्देशक है । द्वितीय उद्देशक समाप्त हो चुका है । अब तीसरा उद्देशक शुरु किया जाता है । इन दोनों का परस्पर संबंध इस प्रकार है । दूसरे उद्देशक के अंत में प्रतिपादित किया गया है कि पापों से-अशुभ कर्मों से विरत पुरुष संसार रूपी समुद्र को पार कर जाते हैं । अब इस उद्देशक में यह निरूपित किया जायेगा कि साधु के समक्ष कभी परीषह और उपसर्ग उदीर्ण हो-उपस्थित हो तो उनको सहना चाहिये क्योंकि वैसा करने से ही अज्ञान प्रसूत कर्म नष्ट होते हैं । नियुक्तिकार इस तृतीय उद्देशक का अधिकार आख्यात करते हुए कहते हैं कि-परीषह और उपसर्गों को सहने से अज्ञान प्रसूत कर्मों का अपचय-अपगम या नाश होता है । अतः साधु को उन्हें सहन करना चाहिये। यह तीसरा उद्देशक यही बताने के लिये हैं । इसका पहला सूत्र यह है - संवुडकम्मस्स भिक्खुणो, जं दुक्खं पुढे अबोहिए । ते संजमओऽवचिजई, मरणं हेच्च वयंति पंडिया ॥१॥ छाया - संवृत्तकर्मणः भिक्षोः यदुःखं स्पृष्ट मवोधिना । तत्संयमतोऽवचीयते मरणं हित्वा व्रजन्ति पंडिताः ॥ अनुवाद - जिस श्रमण ने कर्मों को संवृत कर दिया है-अष्ट विध कर्मों का आगमन रोका दिया है । उसके अज्ञान के कारण जो कर्म बंधे हुए हैं । वे संयम के अवसरण से-पालन से क्षीण हो जाते हैं, वैसे पंडित-ज्ञानी, विवेकी पुरुष मृत्यु को पार कर मोक्ष को स्वायत्त कर लेते हैं । टीका - संवृतानि निरुद्धानि कर्माणि अनुष्ठानि सम्यगनुपयोगरूपाणिवा मिथ्यादर्शनाविरति प्रमाद कषाय योगरूपाणि वा यस्य भिक्षोः साधोः स तथा तस्य यद् दुःख मसवेद्यं तदुपादानं वाऽष्टप्रकारं कर्म स्पृष्टमिति बद्धस्पृष्ट निकाचितमित्यर्थः तच्चात्र अवोधिना अज्ञानेनोपचितंसत्संयमतोमानीन्द्रोक्तात् सप्तदशरूपादनुष्ठानाद् अपचीयते प्रतिक्षणं क्षय मुपयाति एतदुक्तं भवति यथा तटाकोदरसंस्थितमुदकं निरुद्धापरप्रवेशद्वारं सदादित्यकरसम्पर्कात् प्रत्यहमपचीयते एवं संवृताश्रवद्वारस्य भिक्षोरिन्द्रिय योगकषायम्प्रति संलीनतया संवृतात्मनः सतः संयमानुष्ठानेन चानेकभवाज्ञानोपचितं कर्म क्षीयते, ये च संवृतात्मानः सदनुष्ठायिनश्च ते हित्वा त्यक्त्वा मरणं मरण स्वभाव मुपलक्षणत्वाजातिजरामरण शोकादिकं त्यक्त्वा मोक्षं व्रजन्ति पंडिताः सदसद्विवेकः, यदिवा पण्डिता सर्वज्ञा एवं वदन्ति यत् प्रागुक्तमिति ॥१॥ टीकार्थ - जिस भिक्षु ने-मुनि ने कर्मों का विरोध-संवरण कर दिया है, अथवा सम्यक् अनुपयोग रूप अनुष्ठान द्वारा मिथ्यादर्शन अविरति, प्रमाद, कषाय एवं भोग रूप कर्मों को रोक दिया है, उस भिक्षु को ( 178
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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