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________________ श्री सूत्रकृताङ्गसूत्रम् छाया - 'छन्दसा प्रलीयन्ते इमाः प्रजाः बहुमायाः मोहेन प्रावृत्ताः । विकटेन प्रलीयते माहनः शीतोष्णं वचसाऽधिसहेत ॥ अनुवाद - बहुत प्रकार की माया-छलना या प्रवञ्चना करने वाले मोहाच्छन्न लोग अपनी ही इच्छा से-वासना द्वारा नरक आदि गतियां प्राप्त करते हैं किन्तु साधु मोक्ष का लक्ष्य लिये अपने निश्छल-निर्मल कर्मों द्वारा संयान में तत्पर रहते हैं । वे मन, वचन और कर्म द्वारा ठंड, गर्मी आदि समभावपूर्वक सहते हैं । टीका - उपदेशान्तरमाह - 'छन्दः' अभिप्रायस्तेन तेन स्वकीयाभिप्रायेण कुगतिगमनैकहेतुना 'इमाः प्रजाः' अयं लोकस्तासु गतिषु प्रलीयते, तथाहिछागादिवधमपि स्वाभिप्रायग्रहग्रस्ताः धर्मसाधनमित्येवं प्रगल्भमाना विदधति, अन्ये तु संधादिकमुदिश्य दासीदासधनधान्यादिपरिग्रहं कुर्वन्ति, तथाऽन्ये मायाप्रधान : कुक्कुटैरसकृदुत्प्रोक्षणश्रोत्रस्पर्शनादिभिर्मुग्धजनं प्रतारयन्ति, तथाहि__"कुक्कुटसाध्यो लोको नाकुक्कुटतः प्रवर्तते किञ्चित् । तस्माल्लोकस्यार्थे पितरमपि स कुक्कुटं कुर्यात् ॥१॥" तथेयं प्रजा बहुमाया' कपटप्रधाना, किमिति ? यतो मोह: अज्ञानं तेन 'प्रावृता' आच्छादिता सदसद्विवेकविकलेत्यर्थः, तदेतदवगम्य 'माहणे' त्ति साधुः 'विकटेन' प्रकटेनामायेन कर्मणा मोक्षे संयमे वा प्रकर्षेण लीयते प्रलीयते, शोभन भावयुक्तो भवतीति भावः तथा शीतं च उष्णं च शीतोष्णं शीतोष्णा वा अनुकूलप्रतिकूलपरीषहास्तान् वाचा कायेन मनसा च करणत्रयेणाऽपि सम्यगधिसहेत इति ॥२२॥ टीकार्थ - प्रजाजन-लोग अपने अपने अभिप्राय या परिणाम के अनुसार भिन्न भिन्न गतियाँ प्राप्त करते हैं । उनके दुर्गति में जाने का एकमात्र कारण उनका अपना (अशुभ) परिणाम या भाव ही है। कई ऐसे लोग भी हैं जो बकरे आदि प्राणियों का हनन करना अपने सिद्धान्तानुरुप धर्म का हेतु मानते हैं । वे बड़ी धृष्टता के साथ वैसा करते हैं । कई ऐसे दूसरे अन्य लोग भी हैं जो अपने संघ आदि के प्रयोजन हेतु दास-दासी, धन-धान्य आदि का जो परिग्रह है, संग्रह करते हैं । कई ऐसे व्यक्ति है जो अपनी देह पर बार-बार पानी के छींटे देते हैं, कानों को स्पर्श करते हैं । इस प्रकार की प्रवञ्चना पूर्ण प्रवृत्तियों द्वारा वे भोले-भाले लोगों को ठगते हैं । वे ऐसा कहते हैं कि यह लोक कुक्कुट साध्य है । 'कुक्कुट' यहां कपटपूर्ण कार्यों के संकेत हेतु प्रयुक्त है । उनके अनुसार कपट या छलके बिना कोई भी कार्य नहीं होता । अतः लौकिक स्वार्थ हेतु अपने पिता के साथ भी कपटपूर्ण व्यवहार करना चाहिये । यह प्रजा-लोग कपटप्रधान है क्योंकि ये मोह का अज्ञान से प्रावृत-ढके हुए हैं । यही कारण है कि वे सत् और असत् के विवेक-ज्ञान से रहित हैं । साधु यह जानकर-ऐसे निरुपण की व्यर्थता समझ कर तत्पर रहता है । इसका आशय यह है कि वह शुभ भाव युक्त रहता है । वह ठंडे, गर्म, अनुकूल तथा प्रतिकूल सभी परिषहों को मन, वचन और शरीर द्वारा समभाव से सहन करता है। कुजए अपराजिए जहा, अक्खेहिं कुसलेहिं दीवयं । कडमेव गहाय णो कलिं नो तीयं नो चेव दावरं ॥२३॥ छाया - कुजयोऽपराजितो यथाऽक्षैः कुशलो दीव्यन् । कृतमेव गृहीत्वा नो कलिं नो त्रैतं नो चैव द्वापरम् ॥ ( 168
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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