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________________ - श्री सूत्रकृताङ्ग सूत्रम् रहा था । तभी एक प्रसंग उपस्थित हुआ कि इस लोक में धर्मिष्ट लोग अधिक हैं या अधर्मिष्ट अधिक हैं। इस पर सभासदों की राय पूछे जाने पर सभी ने यह कहा कि संसार में अधार्मिक पुरुष ही अधिक हैं । सौ में से कोई एकाध ही ऐसा होगा जो धर्म का पालन करता हो। यह श्रवण कर अभयकुमार बोला-आप सभी धर्मिष्ट हैं । यदि इस बात को निश्चित न समझते हों-इसमें संदेह लगता हो तो आप जांच कर लें । सभासदों ने यह स्वीकार किया । ___ तदन्तर अभयकुमार ने एक धवल-सफेद तथा एक कृष्ण-काला ऐसे दो महल बनाये । उसने नगर में यह घोषित करवाया कि जो भी कोई धार्मिक हो वे सभी पूजोपकार का सामान लेकर सफेद महल में प्रवेश करें तथा जो अपने को धार्मिक न मानते हों वे काले महल में जांय । उसके बाद सभी लोग सफेद महल में चले गये । जब वे उस महल से बाहर निकलने लगे तो उनसे प्रश्न किया गया कि तुम लोग किस प्रकार धार्मिक हो, ऐसा पूछे जाने पर किसी ने कहा-मैं कृषक हूँ । बहुत से पक्षी मेरे धान्य के कणों से अपनी तुष्ठि-तृप्ति करते हैं तथा खलिहान से प्राप्त धान्य में से मैं भिक्षा देता हूँ जिससे मुझे धर्म लाभ होता है । अतः मैं धार्मिक हूँ। दूसरे ने कहा-मैं ब्राह्मण हूँ । पितृगण और देवगण का तर्पण करता हूँ । अत: मैं धार्मिक हूँ । दूसरा कहने लगा-मैं वणिक कुलोपजीवी हूँ । मैं व्यापार द्वारा अपना निर्वाह करता हूँ । भिक्षादान आदि कार्य करता हूँ । अतः मैं धार्मिक हूँ । दूसरे ने कहा-मैं कुलपुत्र हूँ-खानदानी रईस हूँ, न्यायानुगत, इतर आश्रय से रहित अपने कुटुम्ब का लालन पालन करता हूँ । इसलिये मैं धार्मिक हूँ । आखिर में एक श्वपाक-चांडाल ने भी कहा कि मैं अपने कुल क्रमागत अपने ही वंश में पीढ़ियों से चले आते धर्म का पालन करता हूँ । तथा मेरे आश्रय में रहने वाले बहुत से मांसभोजी मेरे सहारे जीते हैं । अत: मैं धार्मिक हूँ । यों सभी लोग अपने-अपने व्यवसाय में-कार्यकलाप में धर्म की स्थापना करने लगे किन्तु उन्हीं लोगों मेंसे दो श्रमणोपासक काले महल में संप्रविष्ट थे । उनसे जब यह प्रश्न किया गया कि आपने कौन सा पाप कृत्य किया है । इस पर वे लोग बोले-हमने मदिरा पान के त्याग का नियम लिया था। एक बार उसे भंग कर दिया । वास्तव में मुनि गण ही इस संसार में सही मायने में धर्मिष्ट हैं क्योंकि वे अपने द्वारा स्वीकार किये गये नियमों का पालन करने में सक्षम हैं । कितने दुःख की बात है कि हम लोगों ने मानवभव प्राप्त किया, जैन शासन मिला। मदिरा पीने का परित्याग करके भी अपनी प्रतिज्ञा को नहीं निभा सके । इस प्रकार नियम को तोड़ा, व्रत को भंग किया, इसलिये हम अपने आपको अधार्मिक और अधम से अधम, नीच से नीच समझकर काले महल में प्रविष्ट हुए क्योंकि प्रतिज्ञा लज्जा आदि उत्तम गुणों की जननी है-उन्हें उत्पन्न करती है । वह शुद्ध हृदय युक्त पूजनीया मां के समान है । उसका अनुसरण करने वाले तेजस्वी, आत्म शौर्य के धनी, सत्यव्रत का एक हृदय से अनुसरण करने वाले पुरुष अपने प्राण सुखपूर्वक त्याग देते हैं परन्तु ली गई प्रतिज्ञा का त्याग नहीं करते-नहीं छोड़ते । धधकती हुई अग्नि में प्रवेश कर जांय यह उत्तम है किन्तु चिर संचित-बहुत काल से संयोजे हुए व्रत को भंग करना अच्छा नहीं है । सुविशुद्ध चेत्ता-उत्तम चित्तयुक्त पुरुष की मृत्यु अच्छी है किंतु जो व्यक्ति शील से स्खलित-पतित हो गया हो उसका जीना अच्छा नहीं है। ___यों सभी लोग अक्सर अपने आपको धार्मिष्ठ समझते हैं । इस प्रकार धर्म को जो बहुत जन नमन कहा गया है, वह ठीक ही है । धर्म में जागरूक होता हुआ मानव धन, सम्पत्ति, धान्य अनेक पदार्थ, कलत्र, अन्तरवर्ती ममत्त्व आदि में आसक्त न होकर-न बंधकर जीवन में धर्म को साकार करता है. सही माने में वह धार्मिक है । उत्तरगाथा का इससे संबंध है । (156
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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