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________________ - श्री सूत्रकृताङ्ग सूत्रम् इणमन्नं तु अन्नाणं, इह मेगेसि माहियं । देवउत्ते अयं लोए, बंभउत्तेति आवरे ॥५॥ छाया - इदमन्यत्त्वज्ञान मिहकेषा माख्यातम् । देवोप्तोऽयं लोकः ब्रह्मोप्त इत्यपरे ॥ अनुवाद - पहले जो अज्ञान चर्चित हुआ है उसके अतिरिक्त एक दूसरा अज्ञान भीहै जिसके अनुसार कुछेक वादी ऐसा कहते हैं कि यह लोक किसी देव के द्वारा कृत या रचित है, दूसरे वादी कहते हैं कि इसकी उत्पत्ति ब्रह्मा से हुई है। टीका - साम्प्रमपराज्ञाभिमतोप प्रदर्शनायाह-इदमिति वक्ष्यमाणं, 'तु' शब्दः पूर्वेभ्यो विशेषणार्थः । अज्ञानमिति मोह विजृम्भणम् इह अस्मिन् लोके एकेषां न सर्वेषाम् आख्यातम् अभिप्रायः, किं पुनस्तदाख्यातमिति? तदाह-देवेनोप्तो देवोप्तः, कर्षकेणेव बीजवपनं कृत्वा निष्पादितोऽयं लोक इत्यर्थः । देवै र्वा गुप्तो-रक्षितो देवगुप्तो देवपुत्रो वेत्येवमादिकमज्ञानमिति । तथा. ब्रह्मणा उप्तो ब्रह्मेप्तोऽयंलोक इत्यपरे एवं व्यवस्थिताः । तथा हि तेषामयमभ्युपगमः-ब्रह्मा जगत्पितामहः स चैक एव जगदादावासीत्तेन च प्रजापतयः सृष्टाः तैश्च क्रमेणैतत्सकलं जगदिति ॥५॥ टीकार्थ - अब आगमकार अन्य अज्ञानियों का मत प्रतिपादित करने हेतु कहते हैं - इस गाथा में जो 'इदं' शब्द का प्रयोग हुआ है । इससे आगे प्रतिपादित किये जाने वाले मतो का ज्ञापन होता है । गाथा में 'तु' शब्द का प्रयोग पूर्वोक्त मतों की अपेक्षा इसकी विशेषता प्रकट करने के हेतु है । अर्थात् पहले प्रतिपादित मतों से भिन्न यह मत जो वक्ष्ययाण है-कहा जायेगा अज्ञान या मोह से प्रसूत है । इस श्लोक में सभी का नहीं किन्तु किन्हीं का ऐसा निरूपण है । विषय की स्पष्टता के लिये वह किस प्रकार आख्यात हुआ है-यह प्रश्न उपस्थित करते हुए आगमकार कहते हैं वे अन्य मतवादी-प्रस्तुत सिद्धान्त में विश्वास करने वाले मानते हैं कि जैसे कृषक बीज बोता है तथा उससे वह धान्य आदि पैदा करता है, उसी तरह किसी देव ने इस लोक को निष्पन्न-उत्पन्न किया है अथवा कतिपय देवों द्वारा यह लोक गुप्तरक्षित है-देव इसकी रक्षा करते हैं । गाथा के तृतीय चरण में देव के साथ आये 'उत्' शब्द का प्राकृत व्याकरण के नियमानुसार पुत्र अर्थ भी होता है । इसका अर्थ यह है कि यह लोक देव का पुत्र है । पुत्र जैसे पिता से उत्पन्न होता है वैसे ही यह देव से उत्पन्न है । इस प्रकार अज्ञानवादियों का ऐसा अभिमत है । दूसरे कहते हैं कि यह लोक ब्रह्मा से उत्त-निष्पादित या उत्पादित है । उनका यह मन्तव्य है कि ब्रह्मा संसार के पितामह है । उनके अनुसार वे जगत के आदि-प्रारंभ में एक ही थे उन्होंने प्रजापतियों की सृष्टि की तथा प्रजापतियों ने क्रमशः समस्त जगत को रचा-बनाया । ईसरेण कडे लोए, पहाणाइ तहावरे । जीवाजीवसमाउत्ते, सुहदुक्खसमन्निए ॥६॥ छाया - ईश्वरेण कृतो लोकः प्रधानादिना तथाऽपरे । जीवाजीवसमायुक्तः सुखदुःखसमन्वितः ॥ --96D
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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