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________________ स्वसमय वक्तव्यताधिकारः समुद्र में भटकते हुए दुःख पाते रहते हैं । इस संबंध में आगमकार दृष्टान्त उपस्थित करते हैं-समुद्र में उत्पन्न एक पृथुरोमयुक्त-मोटे बालों से युक्त विशाल नामक विशिष्ट जाति से संबद्ध अथवा विशाल-वृहत् शरीर युक्त मछली समुद्र में तरंगे उठने पर वायु के प्रबल वेग से टकराती हुई तरंगों से ऊँचे उठती जल की लहरों से ताड़ित होकर नदी के किनारे पर चली आती है और तरंगों के वापस हट जाने पर जब वहां आया हुआ जल शीघ्र ही सूख जाता है, तब वह मछली अपने शरीर की विशालता के कारण नदी तट पर ही पड़ी रह जाती है । मांसभक्षी ढंक एवं कंक आदि जन्तुओं तथा मांस तथा वसा-चर्बी के लोभी मनुष्यों द्वारा जिन्दी ही छिन्न भिन्न कर दी जाती है-काटी जाती है । उसे कोई शरण देने वाला-रक्षक नहीं होता । वह कष्ट पाती हुई मर जाती है। यहां 'तु' शब्द एवं के अर्थ में है । इसलिये त्राण या कोई त्राणप्रद-शरण देने वाला रक्षक न होने से वह नाश को प्राप्त करती है । इन दो गाथाओं का यह अभिप्राय है। एवं तु समणो एगे वट्टमाणसुहेसिणो। मच्छा वेसालिया चेव, घातमेस्संति णंतसो ॥४॥ छाया - एवन्तु श्रमणा एके वर्तमान सुखैषिणः । मत्स्याः वैशालिकाश्चेव घातमेष्यन्त्यनन्तशः ॥ अनुवाद - इसी प्रकार जो श्रमण-वतर्मान सुखों की इच्छा-कामना से युक्त होते हैं, वे वैशालिक मत्स्य की तरह इस संसार में अनन्त बार घात प्राप्त करते हैं-जन्मते मरते हैं। टीका - एवं दृष्टान्तमुपदर्श्य दार्टान्तिके योजयितुमाह-यथैतेऽनन्तरोक्ताः मत्स्या स्तथा श्रमणाः श्राम्यन्तीति श्रमणा एके शाक्यपाशुपतादयः स्वयूथ्या वा किम्भूतास्त इति दर्शयति-वर्तमान मेव सुख माधाकर्मोपभोगजनित मेषितुं शीलं येषान्ते वर्तमानसुखैषिणः समुद्रवायसवत् तत्कालावाप्तसुखलवाऽऽसक्तचेतसोऽनालोचिताधाकर्मोपभोगजनितातिकटुकदुःखौघानुभवाः, वैशालिकमत्स्याइव घातं विनाशम् एष्यन्ति अनुभविष्यन्ति अनन्तशोऽरहट्टघटीन्यायेन भूयो भूयः संसारोदन्वति निमज्जनं कुर्वाणाः न ते संसाराम्भोधेः पारगामिनो भविष्यन्तीत्यर्थः ॥४॥ टीकार्थ - पहले दो गाथाओं में जो दृष्टान्त प्रतिपादित किया गया अब आगमकार उस द्वारा प्रतिपाद्यनिरूपणीय सार बतलाते हैं - जिस प्रकार वैशालिक-विशालकाययुक्त मत्स्य नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार सांख्य, पाशुपत आदि भिक्षु अथवा कई स्वयूथिक श्रमण नाश को प्राप्त करते हैं । जो श्रम करता है-तपश्चरण करता है उसे श्रमण कहा जाता है । सांख्य, पाशुपत आदि तथा स्वयूथिक किस प्रकार के श्रमण हैं, आगमकार यह दिग्दर्शन कराते हैंवर्तमान काल में जिनसे सुख मिलता है, अनुकूलता प्राप्त होती है, इस प्राकर के आधाकर्म दोषयुक्त आहार के सेवन में वे सुख मानते हैं । जैसे समुद्र का कौआ तत्काल प्राप्त होने वाले तुच्छ सुख में आसक्त रहता है, उसी प्रकार सांख्य तथा पाशुपत आदि भिक्षु तात्कालिक तुच्छ सुखों में-भोगों में आसक्त रहते हैं । वे कोई चिन्तन किए बिना आधाकर्मी आहार का उपभोग करते हैं, परिणामस्वरूप अत्यन्त कठोर दुःखों को वे पाते हैं । पहले कहे गये विशाल देह युक्त मत्स्य के समान वे नाश प्राप्त करते हैं । जैसे रहट्ट के घड़े, कुएं के पानी में बार बार डूबते हैं-उतराते हैं-ऊपर आते हैं । यह क्रम निरन्तर चलता रहता है-कभी बंद नहीं होता। उसी प्रकार वे संसार सागर में भटकते रहते हैं, कभी उसे पार नहीं कर पाते ।। 95
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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