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________________ श्री सूत्रकृताङ्ग सूत्रम् गाथा में आया हुआ 'अथ' शब्द आनन्तर्य-अर्थात् अनन्तरता का बोधक है, अज्ञानवादियों के मत के अनन्तर यह दूसरा क्रियावादियों का दर्शन है जिसका पहले उल्लेख हुआ है । चैत्यकर्म आदि-तद्विषय क्रिया कलाप को जो मोक्ष का मुख्य अंग-उपाय बतलाते हैं, उनका दर्शन क्रियावादी के नाम से अभिहित हुआ है। वे क्रियावादी किस प्रकार के हैं ? ऐसा प्रश्न उठाकर आगमकार कहते हैं-ज्ञानावरणीय आदि कर्मों के संबंध में चिन्तन-पर्यालोचन आदि करना कर्म चिन्ता कहा जाता है, जिनकी कर्म चिन्ता प्रनष्ट हो गई है, मिट गई है, उन्हें कर्म चिन्ता प्रनष्ट कहा गया है अर्थात् जो ज्ञानावरणीयादि कर्मों का सम्यक् ज्ञान प्राप्त नहीं करते और मनमाने रूप से क्रियाएं करते हैं, वे कर्म विषयक सत् चिन्तन से रहित हैं । वे-बौद्ध श्रमण आदि अभिज्ञानज्ञान के बिना उपचित-संग्रहित, किये गये चार प्रकार के कर्मों को बन्धनकारी नहीं मानते, अतएव वे कर्मचिन्ता प्रनष्ट हैं । उनका यह मन्तव्य दुःखस्कन्ध या असातोदय-अशुभ प्रतिकूल भोग रूप दुःख परम्परा को बढ़ाता है । कहीं कहीं 'संसारवर्धनं' ऐसा पाठ है जिसका तात्पर्य यह है कि जो भिक्षु चार प्रकार के कर्मों को बंधन प्रद नहीं मानते वे संसार की, जन्म मरण या आवागमन की वृद्धि करते हैं । जाणं का एणऽणाउट्टी, अबुहो जं च हिंसति । पुट्ठो संवेयइ परं अवियत्तं खु सावजं ॥२५॥ छाया - जानन् कायेनाना कुट्टी, अबुधो यं च हिनस्ति । स्पृष्टः संवेदयति पर मव्यक्तं खलु सावद्यम् ॥ अनुवाद - जो मनुष्य जानता हुआ शरीर से हिंसा नहीं करता किन्तु मानसिक हिंसा करता है तथा जो पुरुष नहीं जानता हुआ शरीर से हिंसा करता है पर मन से नहीं करता वह केवल स्पर्श मात्र ही कर्मों का बन्ध करता है क्योंकि किये जाते दोनों प्रकार के कर्म बन्ध अव्यक्त-अस्पष्ट है । टीका - यथा ते कर्म चिन्तातो नष्टास्तथा दर्शयितुमाह - यो हि जानन् अवगच्छन् प्राणिनो हिनस्ति, कायेन चानाकुट्टी 'कुट्ट छेदने' आकुट्टन माकुट्टः स विद्यते यस्यासावाकुही नाकुट्यनाकुट्टी, इदमुक्तम्भवतियो हि कोपादेनिमित्तात् केवलं मनोव्यापारेण प्राणिनो व्यापादयति न च कायेन प्राण्यवयवानां छेदनभेदनादिके व्यापारे वर्तते न तस्यावा तस्य कर्मोपचयो न भवतीत्यर्थः । तथा अबुधोऽजानानः कायव्यापारमात्रेण यञ्च हिनस्ति प्राणिनं, तत्रापि मनोव्यापाराभावान्न कर्मोपचय इति । अनेन च श्लोकार्थेन यदुक्तं नियुक्तिकृता यथा"चतुर्विधं कर्म नोपचीयते भिक्षु समय" इति, तत्र परिज्ञोपचितविज्ञोपचिताख्यं भेदद्वयं साक्षादुपात्तं शेषन्त्वी-पथस्वप्नान्तिकभेदद्वयं चशब्देनोपात्तं तत्रेरणमी--गमनं तत्संबद्धः पन्था इ-पथस्तत्प्रत्ययं कर्मेर्यापथम्एतदुक्तम्भवति पथि गच्छतो यथाकथञ्चिदनभिसन्धेर्यत् प्राणिव्यापादनम्भवति तेन कर्मणश्चयो न भवति तथा स्वप्नान्तिकमिति-स्वप्नएव लोकोक्त्या स्वप्नान्तः स विद्यते यस्य तत्स्वप्नान्तिकं तदपि न कर्मबन्धाय, यथा स्वप्ने भुजिक्रियायां तृप्त्यभावस्तथा कर्मणोऽपीति, कथन्तर्हि तेषां कर्मोपचयो भवतीति ? उच्यते, यद्यसौ हन्यमानः प्राणीभवति हन्तुश्च यदि प्राणीत्येवं ज्ञानमुत्पद्यते तथैनं हन्मीत्येवं च यदि बुद्धिः प्रादुःष्याद् एतेषु च सत्सु यदि कायचेष्टा प्रवर्तते तस्यामपि यद्यसौ प्राणी व्यापाद्यते ततो हिंसा ततश्च कर्मोपचयो भवतीति, एषा मन्यतराभावेऽपि न हिंसा न च कर्मचयः। अत्र च पञ्चानां पदानां द्वात्रिंशद्भङ्गाः भवन्ति, तत्र प्रथमभङ्गे हिंसकोऽपरेष्वेकत्रिंशत्स्वहिंसकः तथा चोक्तम् 82
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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