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________________ [ कर्मप्रकृति स्थितिबंध, उ तथा, पुरिस संजलणे - पुरुषवेद और संज्वलन त्रिक में, जट्ठि – यत्स्थिति, सगऊणजुत्तो - — स्व की कम की गई (अबाधा ) युक्त, आवलीदुगूणओ - दो आवलिका हीन, तत्तो – उसमें से । ६२ ] गाथार्थ - आवरण अर्थात् ज्ञानावरण (पंचक) और अन्तराय (पंचक), दर्शनावरणचतुष्क, संज्वलन लोभ, वेदक सम्यक्त्व और चारों आयुकर्म की प्रकृतियों का एक समय प्रमाण जघन्य स्थितिसंक्रम है तथा एक समयाधिक आवलिका प्रमाण यत्स्थिति है । निद्राद्विकका एक समय प्रमाण जघन्य स्थितिसंक्रम है और यत्स्थिति आवलि के असंख्यातवें भाग से अधिक दो आवलिकाल प्रमाण है तथा हास्यषट्क का जघन्य स्थितिसंक्रम संख्यात वर्ष प्रमाण है। तथा अन्तर्मुहूर्त अधिक संख्यात वर्ष प्रमाण उनकी ( हास्यादि षट्क की ) यत्स्थिति है तथा पुरुषवेद और संज्वलनत्रिक का जघन्य स्थितिसंक्रम अबाधारहित जघन्य स्थिति प्रमाण है और यत्स्थिति स्व अबाधायुक्त और दो आवलिका रहित जघन्य स्थितिबंध प्रमाण है। विशेषार्थ आवरण त्ति-अर्थात् ज्ञानावरण की पांचों प्रकृतियां, विघ्न अन्तराय कर्म की पांचों प्रकृतियां, दर्शनावरण कर्म की चार प्रकृतियां (चक्षुदर्शनावरण, अचक्षुदर्शनावरण, अवधिदर्शनावरण, केवलदर्शनावरण), संज्वलन लोभ, वेदक, सम्यक्त्व और चारों आयुकर्म, इन सब बीस प्रकृतियों की अपनीअपनी सत्वव्युच्छित्ति के समय एक समय अधिक आवलि प्रमाण स्थिति के शेष रह जाने पर उदयावलि सकल करणों के अयोग्य है - इस नियम के अनुसार उदयावलि से ऊपर की एक समय प्रमाण स्थिति अपवर्तना संक्रमण के द्वारा अधस्तन समयाधिक आवलिका के त्रिभाग में संक्रांत होती है। इसलिये उस समय सम्पूर्ण स्थिति का परिमाण एक समय अधिक आवलिकाल प्रमाण होता है। इसी बात को प्रकट करने के लिये गाथा में 'जई समयाहिगावलिया' यह पद दिया गया है। ― निद्रा और प्रचला रूप निद्राद्विक का जघन्य स्थितिसंक्रम अपने संक्रम के अन्त में स्वस्थिति की उपरितन एक समय मात्र स्थिति प्रमाण है । वह आवलि के अधस्तन त्रिभाग में निक्षिप्त की जाती है । उस समय यत्स्थिति अर्थात सर्वस्थिति दो आवलिपूर्ण और तीसरी आवलिका असंख्यातवां भाग प्रमाण है। इस विषय में ऐसा ही वस्तुस्वभाव है कि निद्राद्विक की स्थिति में आवलि के असंख्यातवें भाग से अधिक दो आवलि शेष रह जाने पर उपरितन एक समय मात्र प्रमाण वाली स्थिति संक्रांत होती है । किन्तु मतिज्ञानावरण आदि के समान एक समय अधिक आवलि के शेष रहने पर संक्रम नहीं होता है । अब जिन प्रकृतियों का पर प्रकृतियों में जघन्य स्थितिसंक्रम संभव है, उनका प्रतिपादन करते हैं कि हास्य, रति, अरति, भय, शोक, जुगुप्सा, रूप हास्यषट्क की क्षपक द्वारा अपवर्तनाकरण से संख्यात वर्ष प्रमाण स्थिति कर दी जाती है । तब अपने निर्लेपन (क्षय) काल में संज्वलन क्रोध में प्रक्षिप्त की जाती है । अतः
SR No.032438
Book TitleKarm Prakruti Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShivsharmsuri, Acharya Nanesh, Devkumar Jain
PublisherGanesh Smruti Granthmala
Publication Year2002
Total Pages522
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size39 MB
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